पुल बचा, रास्ते बह गए… क्या अब पुल के गिरने का इंतज़ार कर रहा है प्रशासन?
हिमाचल प्रदेश की इंदौरा तहसील के मंड भोगरवां क्षेत्र में साल 2025 की भीषण बाढ़ की तबाही के निशान आज भी साफ़ दिखाई दे रहे हैं। बाढ़ के प्रचंड प्रवाह में मंड भोगरवां का पुल तो जैसे-तैसे खड़ा रह गया, लेकिन इसे दोनों तरफ़ से जोड़ने वाले एप्रोच मार्ग पूरी तरह बह गए।
कभी लोगों को उनकी मंज़िल तक पहुँचाने वाला यह पुल आज खुद रास्ते से कटकर बीच नदी में एक अलग-थलग ढाँचे की तरह खड़ा है। बाढ़ के दौरान इस इलाके के ग्रामीणों को भारी नुकसान उठाना पड़ा था, जिसमें घर, उपजाऊ खेत, फसलें और पशुधन तबाही की भेंट चढ़ गए थे। स्थानीय लोगों का गंभीर आरोप है कि क्षेत्र में क्रशर संचालकों द्वारा किए गए बेतहाशा और अवैध खनन ने बाढ़ के प्रकोप तथा तबाही के मंज़र को और अधिक भयावह बना दिया था।
हालाँकि, इस तबाही के बाद भी ज़मीनी हक़ीक़त में कोई सुधार होता नहीं दिख रहा है। उसी कटे हुए पुल के ठीक आसपास आज भी बेफ़िक्र होकर भारी मशीनें और टिप्पर चलाए जा रहे हैं। दिन के उजाले में खुलेआम नदी के तल से खनिज संपदा निकाली जा रही है और मशीनों की बकेट से उठाकर टिप्परों में सामग्री भरी जा रही है। ऐसे में सबसे बड़ा सवाल यह उठता है कि जिस पुल के पहुँच मार्ग तक बह चुके हैं, उसके इतने नज़दीक हो रही खुदाई की निगरानी आख़िर कौन सा विभाग कर रहा है? माइनिंग विभाग को यह स्पष्ट करना चाहिए कि यह खुदाई किस अनुमति के तहत हो रही है, स्वीकृत खनन क्षेत्र की सीमा कहाँ तक है और क्या पुल की सुरक्षा को लेकर संबंधित विभागों ने कोई तकनीकी जाँच रिपोर्ट तैयार की है।
इस स्थिति ने स्थानीय प्रशासन, खनन विभाग और पुलिस की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। यदि यह कार्य वैध अनुमति के तहत हो रहा है, तो उसकी शर्तें और सीमांकन सार्वजनिक किया जाना चाहिए और यदि यह अवैध है, तो खुलेआम चल रही इन मशीनों पर अब तक शिकंजा क्यों नहीं कसा गया? इसके साथ ही क्षेत्र के राजनीतिक प्रतिनिधियों, चाहे वे सत्ता पक्ष के हों या विपक्ष के, उनकी चुप्पी पर भी सवाल उठ रहे हैं कि उन्होंने इस गंभीर जनसमस्या और अवैध खनन के मुद्दे को किस स्तर पर उठाया है। मंड भोगरवां का यह आधा-अधूरा खड़ा पुल सिर्फ़ पिछली आपदा की निशानी भर नहीं है, बल्कि प्रशासनिक लापरवाही के बीच आने वाली एक और तबाही की पूर्व चेतावनी है। अब देखना यह होगा कि ज़िम्मेदार विभाग समय रहते कोई ठोस कार्रवाई करते हैं या फिर इस बचे हुए ढाँचे के बह जाने का इंतज़ार कर रहे हैं।












