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कैंची धाम से लेकर विदेशों तक गूंजती है बाबा नीम करौली की महिमा, जानिए कौन थे चमत्कारी संत महाराजजी

कैंची धाम से लेकर विदेशों तक गूंजती है बाबा नीम करौली की महिमा, जानिए कौन थे चमत्कारी संत महाराजजी

​फिल्म हनुमान अंश की सफलता के बीच संत बाबा नीम करौली एक बार फिर चर्चा में आ गए हैं। इस फिल्म के जरिए लोगों की दिलचस्पी उस महान संत के जीवन को गहराई से जानने में बढ़ी है, जिनका नाम आज उत्तराखंड के शांत पहाड़ों से लेकर अमेरिका की आधुनिक दुनिया तक अत्यंत आदर के साथ लिया जाता है। हमेशा कंबल ओढ़े रहने वाले इन अलौकिक संत को उनके भक्त प्रेम से ‘महाराजजी’ पुकारते थे।

​उत्तराखंड के नैनीताल-अल्मोड़ा मार्ग पर स्थित कैंची धाम आज बाबा की सबसे बड़ी पहचान बन चुका है। हर साल 15 जून को यहां विशाल मेला लगता है, जिसमें देश ही नहीं बल्कि विदेशों से भी लाखों श्रद्धालु पहुंचते हैं। लेकिन आखिर कौन थे बाबा नीम करौली? उनका बचपन कैसा बीता और उनके नाम के पीछे की क्या कहानी है? आइए विस्तार से जानते हैं।

​नीब करोरी से नीम करौली बनने की रोचक कहानी

बाबा के नाम को लेकर अक्सर लोगों के मन में जिज्ञासा रहती है कि उन्हें ‘नीब करोरी’ कहा जाए या ‘नीम करौली’। उनका मूल नाम लक्ष्मी नारायण शर्मा था। उनका जन्म उत्तर प्रदेश के फिरोजाबाद जिले के टुंडला क्षेत्र के अकबरपुर गांव में एक संपन्न ब्राह्मण परिवार में हुआ था। उनके पिता का नाम दुर्गा प्रसाद शर्मा और माता का नाम कौशल्या देवी था। जब वे बहुत छोटे थे, तभी उनकी माता का निधन हो गया था।

​बाद में वे उत्तर प्रदेश के फर्रुखाबाद जिले के नीब करोरी गांव पहुंचे। इसी स्थान से उनकी पहचान ‘बाबा नीब करोरी’ के रूप में बनने लगी। स्थानीय मान्यताओं के अनुसार, उन्होंने इसी गांव में एक गुफा के भीतर अत्यंत कठिन साधना की थी। समय के साथ ‘नीब करोरी’ का यह प्रचलित रूप बदलकर ‘नीम करौली’ हो गया और बाबा इसी नाम से पूरी दुनिया में विख्यात हो गए।

​उनके नाम और प्रभाव से जुड़ी एक बेहद प्रसिद्ध ट्रेन की कहानी भी है। कहा जाता है कि एक बार बाबा फर्स्ट क्लास के डिब्बे में बिना टिकट यात्रा कर रहे थे। टिकट न होने के कारण टीटीई ने उन्हें नीब करोरी गांव के पास ट्रेन से नीचे उतार दिया। इसके बाद वे पास ही एक नीम के पेड़ के नीचे शांत मुद्रा में बैठ गए।

​कहानी के अनुसार, बाबा के उतरते ही ट्रेन का पहिया जाम हो गया और वह आगे नहीं बढ़ी। ड्राइवर ने लाख कोशिश की, लेकिन इंजन टस से मस नहीं हुआ। दूसरा इंजन मंगाने का प्रयास भी विफल रहा। आखिरकार रेलवे अधिकारियों और समझदार यात्रियों को अपनी भूल का अहसास हुआ। उन्होंने बाबा से क्षमा मांगी और उन्हें वापस ट्रेन में बैठने का अनुरोध किया। बाबा के डिब्बे में कदम रखते ही ट्रेन चल पड़ी। इस घटना के बाद से ही उस क्षेत्र में रेलवे स्टेशन बनाने और साधुओं का सम्मान करने की परंपरा को बल मिला।

​कम उम्र में वैराग्य और गृहस्थ जीवन

अध्यात्म के प्रति बाबा का झुकाव बचपन से ही था। महज 11 साल की अल्प आयु में उनकी शादी राम बेटी शर्मा के से कर दी गई थी। हालांकि सांसारिक बंधनों के बीच भी उनका मन ईश्वर की भक्ति में ही रमता था। इसी वैराग्य भाव के चलते वे कम उम्र में ही घर-परिवार छोड़कर अज्ञात यात्रा पर निकल पड़े।

​घर छोड़ने के बाद उन्होंने देश के कई हिस्सों की लंबी यात्राएं कीं। वे राजस्थान से होते हुए गुजरात के राजकोट पहुंचे, जहां उनकी अद्भुत भक्ति से प्रभावित होकर मंदिर के महंत ने उन्हें अपना उत्तराधिकारी बनाना चाहा। लेकिन कुछ लोगों के विरोध के बाद उन्होंने वह स्थान छोड़ दिया और गुजरात के ही बावनिया गांव आ गए। वहां एक तालाब के पास कठोर साधना करने के कारण लोग उन्हें ‘तलैया बाबा’ कहकर पुकारने लगे।

​लंबे समय तक अलग-अलग स्थानों पर भटकने और साधना करने के बाद, वे वापस अपने परिवार के पास लौटे और गृहस्थ जीवन की सभी जिम्मेदारियों को पूरी निष्ठा से निभाया। उनके दो बेटे (अनेक सिंह शर्मा और धर्म नारायण शर्मा) और एक बेटी (गिरजा भटेले) हुईं।

​हनुमान जी के अवतार और चमत्कारी संस्मरण

बाबा नीम करौली की सबसे बड़ी विशेषता उनकी अटूट हनुमान भक्ति थी। उनके द्वारा स्थापित सभी प्रमुख स्थलों पर हनुमान जी के भव्य मंदिर उनकी इसीि भक्ति को दर्शाते हैं। उनके करोड़ों अनुयायी उन्हें हनुमान जी का जीवंत अंश या अवतार मानते हैं। उनकी साधारण वेशभूषा, हमेशा ओढ़ा जाने वाला कंबल उनकी सादगी और उच्च आध्यात्मिक स्थिति का प्रतीक था। उनकी मुख्य शिक्षाओं में ‘सब एक’ का विचार सर्वोपरि था, यानी हर जीव में ईश्वर के दर्शन करना। वे लोगों को प्रेम, निस्वार्थ सेवा, सत्य बोलने और भगवान का नाम जपने की प्रेरणा देते थे।

​उनके जीवन से जुड़े चमत्कारों के अनगिनत किस्से आज भी भक्तों की जुबान पर हैं। कई लोगों का मानना है कि वे एक ही समय में अलग-अलग स्थानों पर दिखाई दे जाते थे। वे बिना किसी के बताए उसकी मन की बात या परेशानी पहले ही भांप लेते थे। उनके दरबार में अमीर, गरीब, राजा, रंक और विभिन्न धर्मों के लोग बिना किसी भेदभाव के आते थे। किसी को अपनी बुरी आदत छोड़ने के लिए वे सीधे विवश नहीं करते थे, बल्कि अपनी ऊर्जा और प्रेम से उनके भीतर खुद बदलाव ला देते थे। इस महान संत ने सितंबर 1973 में वृंदावन की पावन भूमि पर अपनी देह त्यागी थी।

​कैंची धाम की स्थापना और इसका महत्व

आज कैंची धाम बाबा की यादों और उनके आशीर्वाद का सबसे बड़ा केंद्र है। इस जगह का नाम यहां सड़क के दो तीखे मोड़ों (कैंची की तरह) के कारण पड़ा था। बाबा के सानिध्य में यहां हनुमान मंदिर की आधारशिला रखी गई।

​15 जून 1964 को यहां हनुमान जी की मूर्ति की प्राण-प्रतिष्ठा की गई, जिसे कैंची धाम के स्थापना दिवस के रूप में मनाया जाता है। बाबा के महासमाधि लेने के बाद वर्ष 1974 में उनके मंदिर का निर्माण कार्य शुरू हुआ और 15 जून 1976 को उनकी मूर्ति की स्थापना की गई। इसके अलावा नैनीताल का प्रसिद्ध हनुमानगढ़ी मंदिर भी बाबा की ही प्रेरणा से अस्तित्व में आया था।

​विदेशों तक कैसे फैला बाबा का प्रभाव?

अध्यात्म की यह पावन धारा भारत की सीमाओं को लांघकर सात समंदर पार अमेरिका और यूरोप तक पहुंच गई। अमेरिकी आध्यात्मिक शिक्षक राम दास (मूल नाम रिचर्ड अल्पर्ट, जो हार्वर्ड विश्वविद्यालय में मनोविज्ञान के प्रोफेसर थे) 1967 में भारत यात्रा के दौरान बाबा के संपर्क में आए। बाबा के सानिध्य ने उनके जीवन की दिशा पूरी तरह बदल दी।

​राम दास ने अपनी प्रसिद्ध पुस्तक ‘Miracle of Love’ के माध्यम से बाबा के चमत्कारों और उनकी प्रेम की संदेश को पश्चिमी देशों तक पहुंचाया। राम दास के अलावा कृष्ण दास, जय उत्तल जैसे संगीतकार भी उनके प्रमुख शिष्यों में शामिल हुए। इसके अलावा एप्पल के संस्थापक स्टीव जॉब्स, फेसबुक के सीईओ मार्क जुकरबर्ग और हॉलीवुड अभिनेत्री जूलिया रॉबर्ट्स जैसी वैश्विक हस्तियों का नाम भी बाबा नीम करौली की आस्था से जुड़कर दुनिया भर में चर्चा का विषय बना, जो आज भी इस आध्यात्मिक परंपरा की प्रासंगिकता को जीवित रखे हुए है।

Ami News
Author: Ami News

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