शिक्षा या मुनाफे का बाज़ार? जिस कीमत में माता-पिता ने की ग्रेजुएशन, आज उतने में आ रहा है तीसरी का ‘बुक-सेट’
निजी स्कूलों और पब्लिशर्स की ‘सांठ-गांठ’ ने बिगाड़ा आम आदमी का बजट; सोशल मीडिया पर फूटा अभिभावकों का गुस्सा, अब सांसदों से गुहार।

लुधियाना/देशभर: “मैंने अपनी पूरी ग्रेजुएशन 5 से 7 हजार रुपए में पूरी की थी, लेकिन आज मेरे बच्चे की पहली कक्षा की किताबों का सेट ही 5 हजार का आ रहा है।” यह केवल एक अभिभावक का दर्द नहीं है, बल्कि देश के उन लाखों मध्यमवर्गीय परिवारों की हकीकत है, जिनके लिए बच्चों की शिक्षा अब एक ‘लग्जरी’ बनती जा रही है।
निजी स्कूलों में नया शैक्षणिक सत्र शुरू होते ही किताबों और वार्षिक शुल्क के नाम पर होने वाली ‘अघोषित लूट’ ने सोशल मीडिया से लेकर सड़कों तक हंगामा खड़ा कर दिया है। अभिभावकों का आरोप है कि स्कूल प्रबंधन और प्राइवेट पब्लिशर्स के बीच ‘कमीशन का खेल’ इस कदर हावी है कि सरकार और प्रशासन मूकदर्शक बने हुए हैं।
सोशल मीडिया पर वायरल हुआ ‘महंगी शिक्षा’ का दर्द
हाल ही में एक महिला का वीडियो सोशल मीडिया पर जबरदस्त वायरल हो रहा है, जिसमें वह अपनी चौथी कक्षा में पढ़ने वाली बेटी की मात्र 5 किताबों और 8 कॉपियों का बिल (3,298 रुपए) दिखाकर भावुक हो गईं। उन्होंने तुलना करते हुए बताया कि उनके समय में बीएससी की साल भर की फीस 2,700 रुपए हुआ करती थी। इस वीडियो के कमेंट बॉक्स में शिकायतों की बाढ़ आ गई है:
- सौरभ (अभिभावक): “मेरे बेटे की पहली कक्षा का सेट 11,000 रुपए का आया है।”
- डॉ. संजीवनी: “चौथी कक्षा के लिए 7,000 रुपए वसूले गए।”
- बिंदिया शर्मा: “आठवीं कक्षा के सेट के लिए 5,400 रुपए देने पड़े।”
NCERT को दरकिनार कर ‘कमीशन’ की सेटिंग
सीबीएसई (CBSE) के स्पष्ट निर्देश हैं कि स्कूलों में केवल NCERT की सस्ती और मानक किताबें ही लगानी चाहिए। बावजूद इसके, प्राइवेट स्कूल प्रबंधन 40 से 50 प्रतिशत तक के मोटे कमीशन के लालच में निजी प्रकाशकों (Private Publishers) की महंगी किताबें थोप रहे हैं।
मुनाफाखोरी का मास्टर प्लान:
- एडीशन में बदलाव: हर साल किताबों के कवर या कुछ पन्ने बदलकर नया एडीशन निकाल दिया जाता है ताकि पुरानी किताबें किसी काम न आ सकें।
- फिक्स्ड वेंडर: स्कूलों ने विशेष वेंडर तय किए हुए हैं, जहां बाजार भाव से कहीं अधिक कीमतों पर सेट बेचे जा रहे हैं।

विपक्ष और सांसदों से दखल की मांग
जब राज्य सरकारों से कोई राहत नहीं मिली, तो अब परेशान अभिभावकों ने देश की सर्वोच्च पंचायतों—लोकसभा और राज्यसभा का दरवाजा खटखटाया है। सोशल मीडिया के माध्यम से नेता विपक्ष राहुल गांधी और राज्यसभा सांसद राघव चड्ढा से गुहार लगाई जा रही है कि वे संसद में इस मुद्दे को उठाएं और केंद्र सरकार से एक सख्त ‘नेशनल एजुकेशन प्राइसिंग पॉलिसी’ बनाने की मांग करें।
मध्यम वर्ग का सवाल: क्या गरीब पढ़ पाएगा?
अभिभावकों का कहना है कि सरकारी स्कूलों की खस्ताहाल स्थिति का फायदा उठाकर निजी संस्थान फल-फूल रहे हैं। रूबीना नंदा जैसी कई यूजर्स का आरोप है कि सरकारी तंत्र को जानबूझकर कमजोर रखा गया है ताकि शिक्षा का व्यवसायीकरण किया जा सके।
बड़ा सवाल: अगर पहली से पांचवीं तक की किताबों का खर्च ही 10 हजार के करीब होगा, तो क्या एक साधारण आय वाला परिवार अपने बच्चों को ‘अच्छी शिक्षा’ का सपना दिखा पाएगा?

संपादकीय टिप्पणी: शिक्षा जो कभी संस्कार और ज्ञान का माध्यम थी, अब पूरी तरह से मुनाफे के व्यापार में तब्दील हो चुकी है। यह समय है कि सरकारें नींद से जागें और पब्लिशर्स-स्कूलों के इस गठजोड़ पर नकेल कसें।








