गर्भपात के लिए पति की सहमति अनिवार्य नहीं, महिला की इच्छा ही सर्वोपरि – पंजाब एवं हरियाणा हाईकोर्ट

चंडीगढ़ : पंजाब एवं हरियाणा हाईकोर्ट ने महिलाओं के प्रजनन अधिकारों (Reproductive Rights) को लेकर एक बेहद महत्वपूर्ण और ऐतिहासिक फैसला सुनाया है। अदालत ने स्पष्ट कर दिया है कि एक विवाहित महिला को गर्भपात (Abortion) कराने के लिए अपने पति की अनुमति या सहमति की कोई आवश्यकता नहीं है। अदालत ने जोर देकर कहा कि इस मामले में केवल महिला की अपनी इच्छा और मानसिक स्थिति ही सबसे ज्यादा मायने रखती है।

क्या है पूरा मामला?
यह मामला पंजाब के फतेहगढ़ साहिब की एक 21 वर्षीय विवाहित महिला से जुड़ा है। महिला का विवाह इसी साल मई में हुआ था, लेकिन शादी के कुछ समय बाद ही पति के साथ उसके संबंध तनावपूर्ण हो गए। वर्तमान में महिला अपने पति से अलग रह रही है और दोनों के बीच तलाक की कानूनी कार्रवाई चल रही है। इसी दौरान महिला को पता चला कि वह गर्भवती है। वैवाहिक कलह और भविष्य की अनिश्चितता को देखते हुए महिला इस बच्चे को जन्म नहीं देना चाहती थी।
जब महिला ने गर्भपात की मांग की, तो कानूनी पेच फंस गया कि क्या अलग रह रहे पति की सहमति इसके लिए अनिवार्य है? इसी सवाल का जवाब ढूंढने के लिए महिला ने हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया था।

PGIMER की मेडिकल रिपोर्ट और मानसिक स्वास्थ्य
सुनवाई के दौरान जस्टिस सुवीर सहगल की बेंच के निर्देश पर PGIMER चंडीगढ़ के डॉक्टरों के एक मेडिकल बोर्ड ने महिला की जांच की। 23 दिसंबर को सौंपी गई रिपोर्ट में बताया गया कि:
- महिला का गर्भ 16 हफ्ते और एक दिन का है।
- वैवाहिक विवाद और तलाक की प्रक्रिया के कारण महिला पिछले 6 महीनों से गंभीर अवसाद (Depression) से जूझ रही है।
- मेडिकल बोर्ड ने उसे गर्भपात के लिए मानसिक रूप से ‘फिट’ घोषित किया।
अदालत की महत्वपूर्ण टिप्पणी
जस्टिस सुवीर सहगल ने मेडिकल टर्मिनेशन ऑफ प्रेग्नेंसी (MTP) एक्ट का हवाला देते हुए कहा कि कानून के तहत 20 हफ्ते से कम के गर्भ को गिराने की अनुमति है। अदालत ने अपने फैसले में कुछ बड़ी बातें कहीं:
”एक विवाहित महिला खुद यह मूल्यांकन करने के लिए सबसे बेहतर जज है कि वह अपनी गर्भावस्था को जारी रखना चाहती है या उसे समाप्त करना चाहती है। इसमें केवल उसकी रजामंदी और स्वायत्तता ही मायने रखती है।”

अदालत ने माना कि महिला की मानसिक स्थिति और उसकी परिस्थितियों को देखते हुए उसे मजबूर नहीं किया जा सकता। कोर्ट ने याचिका स्वीकार करते हुए महिला को अगले एक सप्ताह के भीतर गर्भपात कराने की अनुमति दे दी है।
फैसले के मायने
कानूनी विशेषज्ञों का मानना है कि यह फैसला उन महिलाओं के लिए एक बड़ी नजीर बनेगा जो वैवाहिक विवादों का सामना कर रही हैं। यह निर्णय स्पष्ट करता है कि एक महिला का अपने शरीर पर पूर्ण अधिकार है और ‘प्रजनन स्वायत्तता’ (Reproductive Autonomy) उसके मौलिक अधिकारों का हिस्सा है।








