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ब्रिटिश भारतीयों में बढ़ता लिंग चयन का चलन: ब्रिटेन की ‘BPAS’ संस्था सवालों के घेरे में

ब्रिटिश भारतीयों में बढ़ता लिंग चयन का चलन: ब्रिटेन की ‘BPAS’ संस्था सवालों के घेरे में

लंदन/नई दिल्ली: भारत में दशकों से चली आ रही कन्या भ्रूण हत्या और लिंग चयन (Sex Selection) की समस्या अब सात समंदर पार ब्रिटेन में भी गहराती जा रही है। एक हालिया रिपोर्ट ने चौंकाने वाला खुलासा किया है कि ब्रिटेन में रहने वाले भारतीय मूल के परिवारों में ‘बेटे की चाह’ के चलते गर्भपात के मामलों में तेजी से वृद्धि हुई है। इस पूरे विवाद के केंद्र में ब्रिटेन की सबसे बड़ी एबॉर्शन सेवा प्रदाता संस्था ‘ब्रिटिश प्रेग्नेंसी एडवाइजरी सर्विस’ (BPAS) है, जिस पर लिंग-चयनात्मक गर्भपात को बढ़ावा देने के गंभीर आरोप लग रहे हैं।

​चौंकाने वाले आंकड़े: 113:100 का अनुपात

​डिपार्टमेंट ऑफ हेल्थ एंड सोशल केयर (DHSC) द्वारा 2017 से 2021 के बीच किए गए एक अध्ययन में पाया गया कि भारतीय मूल के परिवारों में, विशेषकर तीसरे बच्चे के जन्म के समय, लड़कों और लड़कियों का अनुपात 113:100 तक पहुँच गया है।

  • सामान्य अनुपात: 105:100
  • अनुमान: पिछले पांच वर्षों में लगभग 400 बेटियां केवल लिंग चयन के कारण जन्म नहीं ले सकीं।
  • ​सांख्यिकीय रूप से इस आंकड़े को बेहद गंभीर और चिंताजनक माना गया है।

​कानून और संस्था की भूमिका पर विवाद

​ब्रिटेन सरकार की 2014 की गाइडलाइंस के अनुसार, केवल जेंडर के आधार पर गर्भपात कराना पूरी तरह गैरकानूनी है। हालांकि, BPAS जैसी संस्थाओं पर आरोप है कि वे अपनी वेबसाइट और सलाह के जरिए इस मुद्दे पर ‘मौन’ रहकर या अस्पष्ट जानकारी देकर इसे बढ़ावा दे रही हैं।

​कहा जा रहा है कि एबॉर्शन एक्ट में ‘फीटल सेक्स’ (भ्रूण का लिंग) को गर्भपात का आधार नहीं माना गया है, लेकिन इसे स्पष्ट रूप से प्रतिबंधित श्रेणी में भी नहीं रखा गया है। इसी कानूनी ‘लूपहोल’ का फायदा उठाकर कई परिवार दबाव में आकर गर्भपात का रास्ता चुन रहे हैं।

​”सांस्कृतिक संवेदनशीलता” के नाम पर चुप्पी

​महिला अधिकारों और जबरन शादी के खिलाफ लड़ने वाली प्रमुख कार्यकर्ता डेम जसविंदर संघेरा ने इस पर कड़ा ऐतराज जताया है। उनका कहना है कि:

​”दहेज और अन्य सामाजिक कुरीतियों के डर से आज भी लड़कियों को आर्थिक बोझ माना जाता है। हेल्थ प्रोफेशनल्स को ‘कल्चरल सेंसिटिविटी’ या ‘रेसिज्म’ के डर से इस सच्चाई से अपनी आंखें मूंदनी नहीं चाहिए।”

​भारत बनाम ब्रिटेन: कानून का अंतर

​जहाँ भारत में PNDT एक्ट के तहत गर्भ में लिंग का पता लगवाना ही एक दंडनीय अपराध है, वहीं ब्रिटेन में लिंग का पता लगाना आसान है। इसी छूट का दुरुपयोग ब्रिटिश-इंडियन कम्युनिटी में बढ़ रहा है, जो प्रवासन (Migration) के बाद भी पुरानी रूढ़िवादी सोच को ढो रहे हैं।

मुख्य बिंदु:

  • ​BPAS सलाना लगभग 1.10 लाख गर्भपात कराती है, जो देश के कुल मामलों का आधा है।
  • ​’राइट टू लाइफ’ जैसे प्रो-लाइफ समूहों ने संस्था को ‘गैर-जिम्मेदार’ ठहराया है।
  • ​भारतीय मूल की महिलाओं पर परिवार और रिश्तेदारों द्वारा बेटे के लिए दबाव बनाने के मामले सामने आए हैं।
Ami News
Author: Ami News

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