करवा चौथ व्रत को लेकर फैली भ्रांतियां हुईं दूर: सभी महिलाएं रख सकती हैं व्रत, पंचांग भेद के कारण उद्यापन में रहेगा बदलाव
करवा चौथ व्रत और पूजा विधान
करवा चौथ का पर्व महिलाओं के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण माना जाता है, जिसमें वे अपने पति की लंबी आयु, अच्छे स्वास्थ्य और परिवार में सुख-शांति के लिए भगवान गणेश की विधि-विधान से आराधना करती हैं। इस वर्ष करवा चौथ के व्रत को लेकर लोगों के मन में कई तरह के संशय और भ्रांतियां बनी हुई हैं कि क्या यह व्रत कुंवारी लड़कियां या नवविवाहित महिलाएं रख सकती हैं या नहीं। इन सभी सवालों को स्पष्ट करते हुए धर्मगुरुओं ने बताया है कि यह व्रत केवल पतियों के लिए ही नहीं, बल्कि परिवार की सुख-समृद्धि और आरोग्य की कामना के लिए रखा जाता है।
क्या कुंवारी और नवविवाहित महिलाएं रख सकती हैं व्रत?
लोगों के बीच यह बड़ा भ्रम फैला हुआ है कि कुंवारी लड़कियां या इस साल नया व्रत शुरू करने वाली नवविवाहित महिलाएं करवा चौथ का व्रत नहीं रख सकती हैं। इस पर स्थिति स्पष्ट करते हुए बताया गया है कि यह पूरी तरह से एक मिथ्या है। करवा चौथ का व्रत कोई भी रख सकता है, चाहे महिला नवविवाहित हो, पुरानी हो या फिर अविवाहित हो। चूंकि यह व्रत सीधे तौर पर भगवान गणेश की पूजा और उनकी आराधना से जुड़ा हुआ है, इसलिए इसे वे सभी लोग रख सकते हैं जो अपने परिवार और प्रियजनों के लिए मंगल कामना करना चाहते हैं।
व्रत की तिथि और उद्यापन में बदलाव
इस वर्ष करवा चौथ की तिथि और समय को लेकर थोड़ा फेरबदल देखने को मिल रहा है। पंचांग के अनुसार, 28 तारीख की रात 1 बजकर 7 मिनट से चतुर्थी तिथि शुरू हो रही है, जो अगले दिन यानी 29 तारीख को रात 10 बजकर 7 मिनट तक रहेगी। तिथि के इस विशेष संयोग के कारण इस बार महिलाएं व्रत का उद्यापन नहीं कर पाएंगी, हालांकि व्रत रखने में किसी भी प्रकार की कोई बाधा या परेशानी नहीं है। उद्यापन न हो पाने का मुख्य कारण तिथि का क्षय या उसका समय चक्र है, इसलिए महिलाएं बिना किसी संशय के पूर्ण श्रद्धा और सात्विकता के साथ अपना उपवास जारी रख सकती हैं।
व्रत का सही स्वरूप और खानपान से जुड़े नियम
आजकल बाजार में और रेस्टोरेंट में “करवा चौथ थाली” के नाम से विशेष व्यंजन परोसे जाने का चलन चल पड़ा है, जिस पर धर्मगुरुओं ने कड़ी आपत्ति जताई है। उनका स्पष्ट संदेश है कि करवा चौथ के व्रत में किसी भी होटल या बाहर के अशुद्ध भोजन का सेवन नहीं करना चाहिए। सभी माताओं और बहनों से यह अनुरोध किया गया है कि वे अपने घर पर ही शुद्ध सात्विक भोजन तैयार करें, भगवान गणेश को उसका भोग लगाएं और उसी सात्विक भोजन से अपने व्रत का पारण करें। व्रत पूरी तरह से सात्विकता, शुद्धता और पारिवारिक कल्याण की भावना पर आधारित होना चाहिए।










