सुई-धागे के जादू से नूरपुर की दिनेश डोगरा ने अंतरराष्ट्रीय स्तर पर चमकाई चंबा रुमाल की कला
परिचय
हिमाचल प्रदेश की पारंपरिक और अनूठी कला चंबा रुमाल को देश ही नहीं, बल्कि सात समंदर पार विदेशों तक पहचान दिलाने वाली नूरपुर की दिनेश डोगरा किसी परिचय की मोहताज नहीं हैं। लगभग पांच दशकों से इस पारंपरिक कढ़ाई कला से जुड़ी दिनेश डोगरा ने कठिन परिस्थितियों का सामना करते हुए इस विरासत को जीवित रखा है और आज यह कला अंतरराष्ट्रीय मंचों पर अपनी चमक बिखेर रही है।
मुख्य बिंदु एवं संघर्ष की कहानी
- 1975 से शुरू हुआ सफर: दिनेश डोगरा ने वर्ष 1975 में अपने घर के बड़े-बुजुर्गों को देखकर इस कला को सीखा और धीरे-धीरे इसे अपना मुख्य व्यवसाय बनाया। उनके परिवार में अन्य महिलाओं ने भी इसे अपनाया, लेकिन समय के साथ पढ़ाई और अन्य प्राथमिकताओं के चलते उन्होंने इसे छोड़ दिया, जबकि दिनेश जी ने इसे निरंतर जारी रखा।
- कला की सबसे बड़ी विशेषता: चंबा रुमाल की कढ़ाई की सबसे बड़ी खासियत यह है कि इसकी बारीक कढ़ाई आगे और पीछे दोनों तरफ से लगभग एक जैसी (उल्टी-सुलटी एक समान) दिखाई देती है। यह हिमाचल की संस्कृति और शादियों में उपहार के रूप में दी जाने वाली एक महत्वपूर्ण परंपरा का हिस्सा है।
- अंतरराष्ट्रीय पहचान (ग्रीस यात्रा): हाल ही में दिनेश डोगरा को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर चंबा रुमाल के लिए ख्याति प्राप्त हुई है, जिसके तहत उन्हें भारत सरकार द्वारा ग्रीस जाने का अवसर मिला। वहां के लोगों ने इस कला और रुमाल पर उकेरी गई आकृतियों (जैसे कृष्ण-राम से जुड़ी कथाएं) को बेहद सराहा।
चुनौतियां और आधुनिकीकरण
- आर्थिक व संसाधन संबंधी मुश्किलें: शुरुआती दौर में गरीबी और तंगी के कारण कपड़े और धागों का प्रबंध करना बहुत कठिन था। पहले सिल्क के धागों को खुद रंगना पड़ता था, जिससे रंग कपड़ों पर फैल जाते थे; इसलिए अब बाजार से सिल्क खरीदकर उसके धागे चीरकर यह कला तैयार की जाती है।
- युवा पीढ़ी का रुझान: आज की युवा पीढ़ी पढ़ाई और अन्य आधुनिक नौकरियों की तरफ अधिक आकर्षित हो रही है, जिससे यह पारंपरिक कला लुप्त होने की कगार पर है। हालांकि, ग्रामीण क्षेत्रों की कुछ नई बहुओं और बेटियों ने इसे सीखा है।
सरकार का सहयोग और कलाकारों की उम्मीदें
- स्टाइपेंड और सहायता: केंद्र और राज्य सरकार द्वारा हस्तकला को बढ़ावा देने के लिए लगातार प्रयास किए जा रहे हैं। वस्त्र मंत्रालय द्वारा बच्चों को ट्रेनिंग के दौरान स्टाइपेंड (जैसे 15,000 रुपये) और मशीनें उपलब्ध कराई गई हैं।
- रंगमहल में शरण: चंबा के रंगमहल में चंबा रुमाल, चंबा थाल और पत्थर का काम करने वाले सभी कलाकारों को एक छत के नीचे स्थान दिया गया है, जिससे पर्यटकों को बढ़ावा मिल सके।
- भविष्य की अपील: दिनेश डोगरा ने सरकार से मांग की है कि नियमित प्रशिक्षण केंद्र (सेंटीटर) चलाए जाएं, ताकि अधिक से अधिक युवा इस कला को सीखकर आर्थिक रूप से आत्मनिर्भर बन सकें और इस प्राचीन संस्कृति को बचाया जा सके।
उन्होंने इस सफलता का श्रेय केंद्र व राज्य सरकार को देते हुए कहा कि ग्रीस जाना उनके लिए एक सपने जैसा था, जहां उनकी कला को 100% लोगों ने पसंद किया।












