जलवायु परिवर्तन का हिमालय पर संकट: लद्दाख से हिमाचल तक पिघल रहे ग्लेशियर, बदल रहा नदियों का मिजाज
हिमाचल प्रदेश से लेकर लद्दाख तक फैले ऊंचे हिमालयी क्षेत्र में जलवायु परिवर्तन अब सिर्फ एक चेतावनी नहीं, बल्कि एक गंभीर सच्चाई बन चुका है। नदियों के जलस्तर और ग्लेशियरों को लेकर देश के शीर्ष संस्थानों के वैज्ञानिकों ने जो अध्ययन सामने रखे हैं, वे बेहद डराने वाले हैं। तापमान में लगातार वृद्धि और ग्लेशियरों के तेजी से सिकुड़ने से न सिर्फ नदियों के बहाव की प्रकृति बदल रही है, बल्कि आने वाले समय में इस पूरे क्षेत्र के लिए जल संकट का खतरा भी गहराता जा रहा है।
हिमाचल प्रदेश और लद्दाख के ऊंचे पहाड़ी क्षेत्रों में जलवायु परिवर्तन का असर अब केवल नदियों में पानी की मात्रा तक सीमित नहीं रहा है। तापमान बढ़ने, बर्फ और ग्लेशियरों के पिघलने के समय में आए बदलाव, नदियों में तलछट (सिल्ट) बढ़ने और किनारों के कमजोर होने से कई घाटियों में नदियों के बहाव का पूरा पैटर्न बदल गया है।
यह चिंताजनक तस्वीर भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान (IIT) इंदौर, जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय (JNU) दिल्ली, भारतीय विज्ञान संस्थान (IISc) बेंगलुरु, अंतरिक्ष अनुप्रयोग केंद्र (SAC) अहमदाबाद, राष्ट्रीय ध्रुवीय एवं समुद्री अनुसंधान केंद्र (NCPOR) गोवा और ब्रिटेन के एबरडीन विश्वविद्यालय के संयुक्त अध्ययनों से सामने आई है।
लद्दाख में तापमान बढ़ा, ग्लेशियरों का द्रव्यमान घटा
लद्दाख पर 2026 में प्रकाशित एक महत्वपूर्ण अध्ययन के अनुसार, वर्ष 1975 से 2024 के बीच इस क्षेत्र के तापमान में औसतन प्रति वर्ष 0.02 डिग्री सेल्सियस की वृद्धि दर्ज की गई है। इसके साथ ही बर्फ पिघलने का समय भी पहले होने लगा है। अध्ययनों में लद्दाख के ग्लेशियरों के द्रव्यमान में लगातार कमी और पहाड़ी झरनों के बहाव में भारी गिरावट दर्ज की गई है। आंकड़ों के मुताबिक, ऊपरी सिंधु की सहायक नदियों में कुल बहाव का 62 से 72 फीसदी हिस्सा सीधे तौर पर बर्फ और ग्लेशियरों के पिघलने वाले पानी पर निर्भर है।
स्टोक क्षेत्र में खेती के लिए मंडराता संकट
लद्दाख के स्टोक क्षेत्र में 2003 से 2019 के बीच हुए एक विशिष्ट अध्ययन से पता चलता है कि वहां वार्षिक नदी बहाव में बर्फ पिघलने की हिस्सेदारी 65%, ग्लेशियर पिघलने की 19% और बारिश की मात्र 16% रही है। इस दौरान अकेले ग्लेशियर क्षेत्र में 4.2 प्रतिशत की कमी दर्ज की गई। स्टोक के 300 से अधिक परिवारों की सिंचित खेती पूरी तरह इसी पानी पर टिकी है। वैज्ञानिकों का मानना है कि बर्फ के समय से पहले पिघलने से शुरुआती दिनों में पानी का बहाव बढ़ सकता है, लेकिन ग्लेशियरों के लगातार सिकुड़ने से आने वाले समय में गर्मियों के दौरान जलापूर्ति का मुख्य आधार कमजोर पड़ जाएगा।
चंद्रा-भागा घाटी में भी पिघल रहे 251 ग्लेशियर
हिमाचल प्रदेश की चंद्रा-भागा नदी तंत्र से जुड़े 251 ग्लेशियरों पर किए गए अध्ययन के चौंकाने वाले आंकड़े सामने आए हैं। वर्ष 1993 से 2019 के बीच इन ग्लेशियरों का कुल क्षेत्र 996 वर्ग किलोमीटर से घटकर 973 वर्ग किलोमीटर रह गया यानी इस दौरान 23 वर्ग किलोमीटर की सीधी कमी आई।
- ग्लेशियर क्षेत्र के घटने की रफ्तार भी तेजी से बढ़ी है।
- यह दर 1993-2000 के दौरान 0.025 वर्ग किलोमीटर प्रति वर्ष थी, जो बढ़कर 2010-2019 में 0.036 वर्ग किलोमीटर प्रति वर्ष हो गई।
- इसके अलावा, इन ग्लेशियरों पर जमा मलबे (डीब्रिस) के क्षेत्र में भी 15.2 प्रतिशत की बड़ी वृद्धि दर्ज की गई है, जो इनके तेजी से पिघलने का एक बड़ा संकेत है।
42 सालों में लद्दाख में 588 वर्ग किलोमीटर ग्लेशियर क्षेत्र गायब
1977 से 2019 के बीच लद्दाख के कुल 2,257 ग्लेशियरों के अभिलेखों का विश्लेषण किया गया। इस लंबी अवधि में लद्दाख का ग्लेशियर क्षेत्र करीब 8,511 वर्ग किलोमीटर से घटकर 7,923 वर्ग किलोमीटर पर आ गया। इसका मतलब है कि इन 42 वर्षों में 588 वर्ग किलोमीटर ग्लेशियर क्षेत्र पूरी तरह कम हो गया और लगभग 97 प्रतिशत ग्लेशियर पीछे हटते चले गए। शुष्क लद्दाख जैसे ठंडे रेगिस्तानी क्षेत्र में इसका सीधा असर वहां की खेती, पशुपालन और स्थानीय नागरिकों की दैनिक जलापूर्ति पर पड़ना तय है।
वैज्ञानिकों का यह साझा अध्ययन स्पष्ट चेतावनी देता है कि यदि समय रहते हिमालयी पारिस्थितिकी तंत्र (Himalayan Ecosystem) को बचाने और ग्लोबल वार्मिंग को नियंत्रित करने के लिए ठोस कदम नहीं उठाए गए, तो आने वाले दशकों में इन क्षेत्रों में भयंकर जल संकट का सामना करना पड़ सकता है।











