भारत में मेल इनफर्टिलिटी का बढ़ता संकट: IVF इंडस्ट्री में आया नया बदलाव
- 40-50% मामलों के जिम्मेदार: इनफर्टिलिटी के कुल मामलों में लगभग आधे मामलों के लिए पुरुष (अकेले या संयुक्त रूप से) जिम्मेदार।
- Tier-II और Tier-III शहरों में उछाल: वाराणसी, गोरखपुर और भोपाल जैसे शहरों से मेल फर्टिलिटी कंसल्टेशन में 45% की हिस्सेदारी।
- उम्र और DNA फ्रैगमेंटेशन: 40 से अधिक उम्र के पुरुषों में DNA फ्रैगमेंटेशन रेट बढ़कर 24% तक पहुंचा।
- IVF मार्केट का विस्तार: भारत का $1.4 बिलियन का IVF बाज़ार 2030 तक 4,00,000 साइकिल प्रति वर्ष तक पहुँचने का अनुमान।
बदलती जीवनशैली और देर से पेरेंटहुड का बड़ा असर
आज की भागदौड़ भरी जिंदगी, बदलती लाइफस्टाइल और करियर की प्राथमिकताओं के कारण भारत में पुरुषों की प्रजनन क्षमता (Male Infertility) पर गहरा असर पड़ रहा है। फर्टिलिटी विशेषज्ञों के अनुसार, अब इनफर्टिलिटी के लगभग 40 से 50 प्रतिशत मामलों के लिए पुरुष जिम्मेदार पाए जा रहे हैं।
अक्सर महिलाओं पर केंद्रित रहने वाली इनफर्टिलिटी की जांच में अब बड़ा बदलाव देखा जा रहा है। पुरुष भी अब स्वयं जांच और इलाज (Evaluation) के लिए आगे आ रहे हैं। इसी कारण भारत के $1.4 बिलियन वाले IVF (In-Vitro Fertilization) मार्केट में मेल इनफर्टिलिटी एक मुख्य ग्रोथ ड्राइवर के रूप में उभर रही है।
“पहले 4 में से केवल 1 इनफर्टिलिटी केस में पुरुषों से जुड़े कारण सामने आते थे, लेकिन आज यह आंकड़ा बढ़कर 3 में से 1 हो चुका है। स्पर्म काउंट, मोटिलिटी (गतिशीलता) में कमी और एबनॉर्मल मॉर्फोलॉजी के मामलों में वास्तविक बढ़ोतरी हुई है।” > — डॉ. मनिका खन्ना (चेयरपर्सन व एमडी, गौडियम IVF)
लैपटॉप, केमिकल्स और स्टेरॉयड: शुक्राणुओं के सबसे बड़े दुश्मन
डॉक्टरों के अनुसार, केवल बढ़ती उम्र ही नहीं, बल्कि दैनिक जीवन से जुड़े कई कारक पुरुषों के फर्टिलिटी हेल्थ को नुकसान पहुँचा रहे हैं:
- स्क्रोटल गर्मी (Heat Exposure): घंटों लैपटॉप का इस्तेमाल, लंबे समय तक बैठे रहना और टाइट कपड़े पहनने से टेस्टिकुलर तापमान बढ़ता है, जिससे स्पर्म प्रोडक्शन प्रभावित होता है।
- हार्मोनल गड़बड़ी और केमिकल्स: प्लास्टिक, पेस्टिसाइड और फ़ूड पैकेजिंग में पाए जाने वाले एंडोक्राइन डिसरप्टिंग केमिकल्स स्पर्म प्रोडक्शन के हार्मोनल सिस्टम में रुकावट डालते हैं।
- एनाबॉलिक स्टेरॉयड: जिम में मसल्स बनाने के लिए स्टेरॉयड का गलत इस्तेमाल स्पर्म काउंट को तेजी से घटा रहा है।
- खराब लाइफस्टाइल: मोटापा, डायबिटीज, स्मोकिंग, पुराना तनाव (Chronic Stress) और अधूरी नींद भी इसके प्रमुख कारण हैं।
देर से पिता बनने की कीमत: 24% तक बढ़ा DNA फ्रैगमेंटेशन
शहरी भारत में पिछले दो दशकों में पहली बार पिता बनने की औसत उम्र बढ़कर 30 साल के पार हो चुकी है। शोध के अनुसार, 30 साल से कम उम्र के पुरुषों में DNA फ्रैगमेंटेशन रेट जहाँ 17% होता है, वहीं 40 साल से अधिक उम्र के पुरुषों में यह बढ़कर 24% तक पहुँच जाता है। करियर और आर्थिक स्थिरता की वजह से पेरेंटहुड में देरी पुरुषों के बायोलॉजिकल हेल्थ पर नकारात्मक असर डाल रही है।
छोटे शहरों (Tier-II & III) में बढ़ी जागरूकता
अब केवल दिल्ली-NCR, बेंगलुरु, हैदराबाद या मुंबई जैसे मेट्रो शहर ही नहीं, बल्कि छोटे शहरों से भी पुरुषों के कंसल्टेशन तेजी से बढ़ रहे हैं। नोवा IVF के मेडिकल डायरेक्टर रोहित गुटगुटिया के अनुसार, वाराणसी, गोरखपुर और भोपाल जैसे उत्तर व मध्य भारत के शहरों से मेल फर्टिलिटी मामलों का योगदान 45% तक पहुँच गया है।
“छोटे शहरों में अब लोग समझ रहे हैं कि इनफर्टिलिटी दोनों जेंडर से जुड़ी समस्या हो सकती है। क्लिनिक अब दोनों पार्टनर्स की एक साथ (Joint Consultation) जांच को प्राथमिकता दे रहे हैं, जिससे सही समय पर इलाज संभव हो पाता है।” > — शोभित अग्रवाल (CEO, नोवा IVF)
IVF इंडस्ट्री का भविष्य और खर्च
भारत में इस समय हर साल लगभग 2,00,000 से 2,50,000 IVF साइकिल होते हैं, जिनके 2030 तक बढ़कर 4,00,000 होने की उम्मीद है।
- उपचार का खर्च: शुरुआती टेस्ट और कंसल्टेशन का खर्च ₹20,000 से शुरू होता है, जबकि उन्नत प्रक्रियाओं जैसे ICSI (Intracytoplasmic Sperm Injection) का खर्च ₹1.2 लाख से ₹2.5 लाख प्रति साइकिल तक हो सकता है।
- रेवेन्यू में हिस्सेदारी: कई फर्टिलिटी क्लिनिक्स के कुल रेवेन्यू का लगभग 40% हिस्सा अब पुरुषों के कंसल्टेशन, डायग्नोसिस और ट्रीटमेंट से आ रहा है।










