चंबा के ऐतिहासिक अंतर्राष्ट्रीय मिंजर मेले का भव्य आगाज, राज्यपाल कविंदर गुप्ता ने किया विधिवत उद्घाटन
रिपोर्टर: जितेंद्र मेहरा
- राज्यपाल कविंदर गुप्ता ने 1300 वर्ष पुराने श्री लक्ष्मी नारायण मंदिर में पूजा-अर्चना कर भगवान रघुनाथ जी को अर्पित की मिंजर।
- ऐतिहासिक चौगान मैदान में मिंजर ध्वज फहराकर मेले का किया औपचारिक शुभारंभ।
- विधानसभा अध्यक्ष कुलदीप सिंह पठानिया भी रहे विशेष रूप से मौजूद।

चंबा: देवभूमि हिमाचल की सांस्कृतिक पहचान, आस्था और लोक परंपराओं का प्रतीक ऐतिहासिक अंतर्राष्ट्रीय मिंजर मेला आज से चंबा में धूमधाम के साथ शुरू हो गया। इस शुभ अवसर पर हिमाचल प्रदेश के महामहिम राज्यपाल कविंदर गुप्ता ने बतौर मुख्य अतिथि शिरकत की। उनके साथ हिमाचल प्रदेश विधानसभा अध्यक्ष कुलदीप सिंह पठानिया भी विशेष रूप से उपस्थित रहे।
मेले के शुभारंभ के अवसर पर राज्यपाल ने सबसे पहले 1300 वर्ष प्राचीन ऐतिहासिक श्री लक्ष्मी नारायण मंदिर में माथा टेका और पूजा-अर्चना की। इसके पश्चात उन्होंने भगवान रघुनाथ जी को चंबा की पारंपरिक मिंजर भेंट की। मंदिर में धार्मिक अनुष्ठान संपन्न करने के बाद राज्यपाल ऐतिहासिक चौगान मैदान पहुंचे, जहां उन्होंने मिंजर मेले का ध्वज फहराकर इस सात दिवसीय अंतर्राष्ट्रीय मेले का विधिवत उद्घाटन किया। इस दौरान उन्होंने समस्त चंबावासियों एवं प्रदेशवासियों को ऐतिहासिक मिंजर मेले की बधाई व शुभकामनाएं दीं।
1000 वर्ष पुराना है मिंजर मेले का इतिहास
मिंजर मेले की समृद्ध विरासत पर प्रकाश डालते हुए राज्यपाल ने कहा कि चंबा का यह ऐतिहासिक मेला सदियों पुरानी परंपरा को अपने में संजोए हुए है। इसका इतिहास लगभग 1000 वर्ष पुराना है। मान्यता के अनुसार, वर्ष 935 ईस्वी में चंबा के राजा की विजय के उपलक्ष्य में जनता ने धान और मक्का की बालियों के प्रतीक ‘मिंजर’ को भेंट कर उनका स्वागत किया था। तब से लेकर आज तक यह परंपरा निरंतर निभाई जा रही है।
संस्कृति और लोक आस्था का अनोखा संगम
हर वर्ष श्रावण मास में आयोजित होने वाले इस मेले में देश-विदेश से हजारों श्रद्धालु और पर्यटक पहुंचते हैं। ध्वजारोहण के साथ शुरू होने वाला यह मेला पूरे सप्ताह चंबा के चौगान को लोक संस्कृति, पारंपरिक वेशभूषा, लोकनृत्य, लोकसंगीत, हस्तशिल्प प्रदर्शनियों और खेल प्रतियोगिताओं से जीवंत कर देता है।
मेले का मुख्य आकर्षण भव्य मिंजर शोभायात्रा होगी, जिसमें देवी-देवताओं की पालकियों के साथ पारंपरिक वाद्य यंत्रों की गूंज और लोक कलाकारों की प्रस्तुतियां पूरे वातावरण को भक्तिमय बना देती हैं। मेले के समापन पर रावी नदी में नारियल, फल, सिक्का और मिंजर अर्पित कर प्रदेश की सुख-समृद्धि और अच्छी फसल की कामना की जाएगी। यह मेला न केवल एक उत्सव है, बल्कि चंबा की समृद्ध सांस्कृतिक विरासत, सामाजिक सौहार्द और लोक आस्था का एक जीवंत प्रतीक है।











