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मानसून से पहले चमका माधोपुर हेडवर्क्स: ₹35 करोड़ से हुआ कायाकल्प, अब ‘मैनुअल’ नहीं पूरी तरह ‘ऑटोमैटिक’ हुआ बैराज

मानसून से पहले चमका माधोपुर हेडवर्क्स: ₹35 करोड़ से हुआ कायाकल्प, अब ‘मैनुअल’ नहीं पूरी तरह ‘ऑटोमैटिक’ हुआ बैराज

​पिछले साल 27 अगस्त को गेट टूटने से मची तबाही से लिया सबक; नए फ्लड गेट, इलेक्ट्रॉनिक मोटराइजेशन और मजबूत सुरक्षा कवच के साथ बाढ़ से निपटने को तैयार सिंचाई विभाग।

, पठानकोट पठानकोट स्थित ऐतिहासिक ‘माधोपुर हेडवर्क्स’ आगामी मानसून सीजन के दौरान किसी भी संभावित बाढ़ की स्थिति से निपटने के लिए पूरी तरह तैयार है। पिछले वर्ष 27 अगस्त को पहाड़ी इलाकों में हुई भारी मूसलाधार बारिश के कारण रावी नदी उफान पर आ गई थी, जिससे पानी के अप्रत्याशित और प्रचंड दबाव को न झेल पाने के कारण माधोपुर बैराज के गेट टूट गए थे। उस समय अनियंत्रित पानी ने निचले इलाकों में भारी तबाही मचाई थी और गेटों को मैनुअल तरीके से बंद करने में प्रशासन के पसीने छूट गए थे।

​इस बार सिंचाई विभाग ने उस भयानक आपदा से कड़ा सबक लेते हुए मानसून सीजन से पहले अभूतपूर्व तैयारियां की हैं। विभाग का दावा है कि इस बार तकनीक और बुनियादी ढांचे को इस कदर मजबूत किया गया है कि पिछले साल जैसी किसी अनहोनी की कोई गुंजाइश नहीं बचेगी।

​ क्या हुए बदलाव? मैनुअल से ‘ऑटोमैटिक’ हुआ बैराज

​सिंचाई विभाग के एसडीओ अजीत कुमार ने बताया कि पिछले साल की आपदा से सीख लेते हुए इस बार बैराज के संचालन में ऐतिहासिक और आधुनिक बदलाव किए गए हैं:

  • इलेक्ट्रॉनिक मोटराइजेशन: जो बैराज गेट पहले पूरी तरह मैनुअल (हाथ से) चलते थे, उन्हें अब पूरी तरह इलेक्ट्रॉनिक और मोटराइज्ड कर दिया गया है।
  • नए कंट्रोल पैनल व अत्याधुनिक वायरिंग: बैराज की पुरानी वायरिंग को पूरी तरह बदलकर नई केबलिंग की गई है और इसके संचालन के लिए अत्याधुनिक कंट्रोल पैनल लगाए गए हैं।
  • सफल टेस्टिंग: विभाग द्वारा सभी गेटों की दो से तीन बार फाइनल टेस्टिंग की जा चुकी है, जिससे अब आपातकालीन स्थिति में पलक झपकते ही गेटों को खोला या बंद किया जा सकेगा।
  • क्षतिग्रस्त ढांचे हुए दुरुस्त: 27 अगस्त की आपदा में जो गेट और एडवांस व ओल्ड स्ट्रक्चर गंभीर रूप से डैमेज हुए थे, उन्हें नए सिरे से पूरी तरह रिपेयर कर पहले से कहीं अधिक मजबूत कर दिया गया है। कुल 54 गेटों की मरम्मत का काम पूरा कर लिया गया है, जिसमें क्षतिग्रस्त हुए 4 फ्लड गेटों के स्थान पर पूरी तरह नए गेट स्थापित किए गए हैं।

​ सुरक्षा कवच: अपस्ट्रीम और डाउनस्ट्रीम में 40 फीट तक ‘वायर क्रेट’

​बाढ़ के दौरान पानी के तेज बहाव और पत्थरों की मार से बैराज के फाउंडेशन (नींव) को बचाने के लिए इस बार बड़े स्तर पर सुरक्षा दीवारें (वायर क्रेट) तैयार की गई हैं। यह काम किसी छोटे हिस्से में नहीं, बल्कि पूरे बैराज पर किया गया है:

    • अपस्ट्रीम में: बैराज के ऊपरी हिस्से की सुरक्षा के लिए 24 फीट के मजबूत वायर क्रेट बनाए गए हैं।
    • डाउनस्ट्रीम में: निचले हिस्से में पानी के कटान को रोकने के लिए 40 फीट के विशाल वायर क्रेट्स का निर्माण मुकम्मल किया जा चुका है। इसके अलावा, हेडवर्क्स परिसर में डाउनस्ट्रीम क्षेत्र में नदी के लगभग 100 मीटर लंबे और 50 मीटर चौड़े हिस्से को कंक्रीट से मजबूत किया गया है। भविष्य में तेज जल प्रवाह से होने वाले नुकसान को रोकने के लिए सुरक्षा हेतु पत्थरों के क्रेट भी लगाए गए हैं।

मरम्मत कार्यों पर लगभग 35 करोड़ खर्च: इन पुनर्निर्माण और अन्य मरम्मत कार्यों पर लगभग 35 करोड़ रुपए खर्च किए गए हैं। इस महत्वपूर्ण परियोजना को हरियाणा की ‘दयानंद कंस्ट्रक्शन कंपनी’ द्वारा पूरा किया गया है।

​ शाहपुरकंडी से आ रहा है 13 हजार क्यूसेक पानी

​एसडीओ अजीत कुमार ने पानी की वर्तमान स्थिति को स्पष्ट करते हुए बताया कि रंजीत सागर डैम से बिजली उत्पादन के बाद पानी शाहपुरकंडी डैम में स्टोर हो रहा है, जहां से इरिगेशन (सिंचाई) के लिए निरंतर 13 हजार क्यूसेक पानी रेगुलेट होकर आ रहा है। इस पानी का वितरण पूरी तरह सुचारू है, जिसका विवरण इस प्रकार है:

पानी की मात्रा (क्यूसेक में)

गंतव्य / लाभार्थी क्षेत्र

400 क्यूसेक

कश्मीरी कैनाल को

3,200 क्यूसेक

पंजाब के रास्ते राजस्थान को

शेष सारा पानी

पंजाब की अपनी फसलों और नहरों के लिए

बेहद ऐतिहासिक है माधोपुर हेडवर्क्स का इतिहास

​पंजाब के माधोपुर में रावी नदी पर स्थित ‘माधोपुर हेडवर्क्स’ एक बेहद ऐतिहासिक बैराज है। इसके इतिहास और विकास की मुख्य बातें इस प्रकार हैं:

  • प्रारंभिक निर्माण (1872-75): इस बैराज का निर्माण पहली बार 19वीं सदी में (1872-75 के आसपास) रावी नदी के जल को ‘ऊपरी बारी दोआब नहर’ (UBDC) में मोड़ने के लिए किया गया था, ताकि इस क्षेत्र में कृषि को बढ़ावा दिया जा सके। यह नहर पंजाब के गुरदासपुर, अमृतसर और तरनतारन जैसे जिलों में कृषि भूमि को सिंचित करती है।
  • आधुनिकरण (1959): बदलते समय के साथ पानी की बढ़ती मांगों को पूरा करने के लिए साल 1959 में इसका पुनरुद्धार और विस्तार किया गया।
  • भारत-विभाजन (1947) में भूमिका: 1947 में भारत के विभाजन के समय, इस ऐतिहासिक हेडवर्क्स को भारत को सौंप दिया गया था, जिससे पूर्वी पंजाब में सिंचाई प्रणाली को सुचारू रूप से चलाने में बड़ी मदद मिली थी।
  • मूल क्षमता: मूल रूप से इसमें 54 बाढ़ द्वार (फ्लड गेट) बनाए गए थे, जिनकी पानी को मोड़ने की क्षमता लगभग 9,000 क्यूसेक तक आंकी गई थी।
Ami News
Author: Ami News

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