पब्लिक इंस्टीट्यूशन कर्मचारियों को ‘यूज एंड थ्रो’ नहीं समझ सकते: पंजाब-हरियाणा हाईकोर्ट
बड़ी टिप्पणी: लगातार काम होने पर सिर्फ पद का नाम बदलकर एक ठेका कर्मचारी की जगह दूसरा नहीं रखा जा सकता; कोर्ट ने दिव्यांग असिस्टेंट प्रोफेसर की बर्खास्तगी रद्द की, बहाली और 6% ब्याज के साथ बकाया सैलरी देने का आदेश।

चंडीगढ़:
पंजाब और हरियाणा हाईकोर्ट ने शैक्षणिक संस्थानों में वर्षों तक ठेके (कॉन्ट्रैक्ट) के आधार पर काम लेने और फिर कर्मचारियों को बदल देने के बढ़ते रुझान पर बेहद तीखी टिप्पणी की है। कोर्ट ने स्पष्ट शब्दों में कहा है कि कोई भी पब्लिक इंस्टीट्यूशन अपने कर्मचारियों के साथ ‘यूज एंड थ्रो’ (इस्तेमाल करो और फेंक दो) जैसा बर्ताव नहीं कर सकता।
जस्टिस संदीप मोदगिल की एकल पीठ ने एक ऐतिहासिक फैसला सुनाते हुए कहा कि यदि किसी संस्था में काम की जरूरत लगातार बनी हुई है, तो सिर्फ पद का नाम बदलकर एक संविदा या ठेका कर्मचारी को हटाकर उसकी जगह दूसरे कर्मचारी को नहीं लगाया जा सकता। कोर्ट ने संस्थान के इस कदम को पूरी तरह शोषणकारी और अवैध ठहराया है।
क्या है पूरा मामला?
यह अहम फैसला रिंपी नाम की एक महिला याचिकाकर्ता (पिटीशनर) की अर्जी पर सुनवाई करते हुए आया है। मामले के मुख्य बिंदु इस प्रकार हैं:
- योग्यता और सेवा: याचिकाकर्ता साल 2021 से केंद्र सरकार के तहत आने वाले ‘डेवलपमेंट स्टडीज विभाग’ में गेस्ट फैकल्टी के तौर पर सेवाएं दे रही थी। उसका चयन बकायदा एक चयन समिति (Selection Committee) द्वारा किया गया था। वह 4 दिसंबर, 2021 से लगातार पढ़ा रही थी और वह 48 प्रतिशत दिव्यांग (Disabled Category) श्रेणी से भी संबंधित है।
- संस्थान की कार्रवाई: साल 2023 में संस्थान ने फिर से कॉन्ट्रैक्ट पर असिस्टेंट प्रोफेसर की पोस्ट के लिए विज्ञापन निकाला। याचिकाकर्ता ने इसके लिए भी आवेदन किया। लेकिन चयन प्रक्रिया पूरी होने से पहले ही, संस्थान ने एक अन्य कॉन्ट्रैक्ट कर्मचारी को नियुक्त कर दिया और 9 मार्च, 2024 को याचिकाकर्ता को सेवामुक्त (Terminated) करने का आदेश जारी कर दिया।
- शोषण का आरोप: याचिकाकर्ता ने दलील दी कि उससे एक परमानेंट/रेगुलर टीचर की तरह पूरा एकेडमिक काम लिया जा रहा था, लेकिन उसे हर महीने सिर्फ 52 हजार रुपये की फिक्स्ड सैलरी दी जा रही थी।
संस्थान की दलीलें कोर्ट ने कीं खारिज
संस्थान ने कोर्ट में अपना बचाव करते हुए दावा किया कि याचिकाकर्ता को सिर्फ 11 महीने के कॉन्ट्रैक्ट पर रखा गया था, इसलिए उसे रेगुलर अपॉइंटमेंट या सेवा जारी रखने का कोई कानूनी हक नहीं है। संस्थान ने यह भी तर्क दिया कि नई चयन प्रक्रिया में उसका सिलेक्शन नहीं हुआ और नया अपॉइंटमेंट एक अलग पोस्ट पर किया गया था।
कोर्ट का कड़ा रुख: > हाईकोर्ट ने संस्थान की इन दलीलों को सिरे से खारिज कर दिया। जस्टिस मोदगिल ने कहा कि अदालत सिर्फ पद का नाम नहीं देखती, बल्कि काम की ‘असल प्रकृति’ (Nature of Work) को देखती है। रिकॉर्ड से साफ है कि पुराना और नया, दोनों कर्मचारी एक ही काम कर रहे थे। इसलिए यह साफ तौर पर एक कॉन्ट्रैक्ट कर्मचारी की जगह दूसरे को रखने का मामला है, जो कानूनन गलत है।

शिक्षा के माहौल पर पड़ता है बुरा असर
हाईकोर्ट ने देश के शैक्षणिक ढांचे पर चिंता जताते हुए कहा:
- एजुकेशनल इंस्टीट्यूशंस में लगातार शॉर्ट-टर्म कॉन्ट्रैक्ट पर नियुक्तियां न सिर्फ कर्मचारियों के भविष्य को असुरक्षित और अस्थिर करती हैं, बल्कि इसका सीधा असर पढ़ाई के माहौल पर भी पड़ता है।
- जब छात्र-छात्राओं को पढ़ाने का काम साल दर साल लगातार चल रहा हो, तो संस्थान शिक्षकों को हमेशा तलवार की धार पर या अस्थिरता की स्थिति में नहीं रख सकते।

हाईकोर्ट का अंतिम आदेश
अदालत ने याचिकाकर्ता के पक्ष में न्याय करते हुए निम्नलिखित आदेश जारी किए:
- तुरंत बहाली: कोर्ट ने 9 मार्च, 2024 के सेवामुक्ति (Relief Order) आदेश को तत्काल प्रभाव से रद्द कर दिया।
- सेवा निरंतरता: याचिकाकर्ता को तुरंत बहाल करने, उसकी सर्विस जारी रखने और सभी परिणामी लाभ (Consequential Benefits) देने का निर्देश दिया।
- ब्याज सहित बकाया सैलरी: संस्थान को आदेश दिया गया है कि याचिकाकर्ता की रुकी हुई या बकाया सैलरी चार हफ्ते के भीतर 6 प्रतिशत सालाना ब्याज के साथ हर हाल में दी जाए।








