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शिक्षा जगत में नई क्रांति: क्या भारतीय स्कूलों में भी शुरू होगा ‘पावर नैप’ का दौर?

क्लास में नींद: सजा नहीं, अब सफलता का ‘पावर डोज’

​क्या आपने कभी सोचा है कि क्लास में झपकी आने पर टीचर आपको डांटने के बजाय आराम से सोने के लिए तकिया थमा दे? भारत में यह कल्पना भले ही अजीब लगे, लेकिन जापान और चीन जैसे देशों में यह एक हकीकत बन चुकी है। इन देशों की शिक्षा व्यवस्था में बच्चों की नींद को अनुशासनहीनता नहीं, बल्कि सफलता की चाबी और दिमाग को रिचार्ज करने का ‘सुपर टूल’ माना जाता है।

जापान: थकान नहीं, मेहनत का सम्मान

जापान में शिक्षा को लेकर एक बहुत ही गहरी सोच प्रचलित है। वहां कई स्कूलों और कॉलेजों में लंच के बाद 20 से 40 मिनट का ‘पावर नैप’ (Power Nap) ब्रेक अनिवार्य रूप से दिया जाता है। हैरानी की बात यह है कि अगर कोई छात्र क्लास के बीच में सो जाता है, तो टीचर उसे जगाने के बजाय सोने देते हैं। जापान में इसे इस बात का संकेत माना जाता है कि बच्चा अपनी पढ़ाई में इतनी मेहनत कर रहा है कि उसका शरीर थक गया है। विशेषज्ञों का कहना है कि इस छोटे से ब्रेक के बाद छात्र अगले पीरियड्स में दोगुनी एकाग्रता के साथ हिस्सा लेते हैं।

चीन: फोल्डिंग डेस्क और घर जैसा बिस्तर

नींद के मामले में चीन की व्यवस्था और भी हाई-टेक है। सोशल मीडिया पर अक्सर ऐसे वीडियो वायरल होते हैं जिनमें चीन के छात्र अपनी क्लासरूम की डेस्क को ही बिस्तर में तब्दील कर देते हैं। वहां स्कूलों में विशेष प्रकार के ‘फोल्डिंग डेस्क’ लगाए गए हैं, जो लंच के बाद बेड का रूप ले लेते हैं। बच्चे अपने साथ घर से कंबल और तकिया लेकर आते हैं। चीन के शिक्षाविदों का मानना है कि दोपहर की नींद बच्चों के मूड को खुशमिजाज बनाती है और उनकी याददाश्त (Memory) को तेज करने में मदद करती है।

भारतीय छात्रों के लिए क्या यह संभव है?

भारत में फिलहाल स्कूलों का शेड्यूल काफी व्यस्त रहता है और यहां सोने की कोई आधिकारिक व्यवस्था नहीं है। हालांकि, देश के प्रमुख बाल मनोवैज्ञानिकों का मानना है कि बदलती जीवनशैली और बढ़ते तनाव के बीच ‘पावर नैप’ भारतीय छात्रों के लिए भी वरदान साबित हो सकता है। भारी स्कूल बैग और ट्यूशन के बोझ के बीच 15-20 मिनट का विश्राम छात्रों के मानसिक स्वास्थ्य को बेहतर कर सकता है।

​मनोवैज्ञानिकों के अनुसार, दोपहर की एक छोटी सी झपकी दिमाग को किसी सुपर कंप्यूटर की तरह रिबूट कर देती है, जिससे छात्र ज्यादा रचनात्मक और ऊर्जावान महसूस करते हैं। अब देखना यह है कि क्या भारत के स्कूल भी इस विदेशी मॉडल को अपनाकर बच्चों के चेहरे पर मुस्कान और दिमाग में ताजगी ला पाएंगे।

Ami News
Author: Ami News

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