“मेरा घर, मेरी खामोशी और जिम्मेदारियों का पहरा”

क्या आपने कभी उस घुटन को महसूस किया है जब आपके सीने में शब्दों का सैलाब हो, पर जुबान पर तालों का पहरा लगा दिया जाए? मैं आज अपनी उन अनकही बातों को पन्नों पर उतार रही हूँ, जिन्हें अक्सर घर की चारदीवारी में “तुम गलत हो” कहकर दफन कर दिया जाता है।
जिम्मेदारियों की बेड़ियाँ
बचपन से सिखाया गया कि बेटियां और बहुएं घर की नींव होती हैं। मैंने भी उसी नींव की तरह चुपचाप सारा बोझ सहा। आज मेरे कंधों पर ढेरों जिम्मेदारियां हैं—घर को संभालना, रिश्तों को संजोना और हर किसी की उम्मीदों पर खरा उतरना। मैं इन जिम्मेदारियों से भागती नहीं हूँ, मैं इन्हें प्यार से निभाना चाहती हूँ। पर दर्द तब होता है जब इन जिम्मेदारियों के बदले मुझे सिर्फ ‘अनदेखा’ किया जाता है।

एक घटना, जो बार-बार दोहराई जाती है
कल भी वही हुआ। जब मैंने परिवार के एक फैसले में अपनी छोटी सी राय (Opinion) रखने की कोशिश की, तो एक गहरी खामोश चीख मेरे अंदर ही रह गई। मुझसे कहा गया, “तुम्हें कुछ नहीं पता, तुम चुप रहा करो।” यह सिर्फ एक दिन की बात नहीं है, यह हर दिन की कहानी है। जब भी मैं अपनी तकलीफ साझा करना चाहती हूँ, मुझे टोक दिया जाता है। मुझे अहसास दिलाया जाता है कि मेरी सोच छोटी है या मैं हमेशा गलत होती हूँ। क्या किसी इंसान का नजरिया सिर्फ इसलिए गलत हो सकता है क्योंकि वह दूसरों की तरह नहीं सोचता?

थकान अब रूह तक पहुँच गई है
मैं थक गई हूँ। यह थकान नींद से दूर होने वाली थकान नहीं है, यह वो थकान है जो तब होती है जब आप खुद को साबित करते-करते हार जाते हैं। जब आप हर किसी को खुश रखने की कोशिश करते हैं, पर आखिर में खुद को सबसे अकेला पाते हैं। मेरा मन करता है कि मैं चीख कर कहूँ कि “मैं भी यहाँ हूँ, मेरी भी अपनी एक पहचान है, मेरी भी भावनाएं हैं।”
ईश्वर: मेरा आखिरी सहारा
जब इंसान के दरवाजे बंद हो जाते हैं, तब ईश्वर का द्वार खुलता है। मेरा भगवान पर अटूट विश्वास ही है जो मुझे हर सुबह उठने की शक्ति देता है। जब दुनिया मुझे “गलत” कहती है, तब मैं मंदिर के कोने में बैठकर रो लेती हूँ, क्योंकि मुझे पता है कि वहाँ मुझे कोई चुप नहीं कराएगा। वहाँ मेरी सिसकियों का भी मोल है।

एक अपील: मत मारिए किसी के आत्मसम्मान को
समाज और परिवारों को यह समझना होगा कि जिम्मेदारी निभाने वाला इंसान कोई मशीन नहीं होता। उसे भी सम्मान और सुनने वाले कान चाहिए। किसी को बार-बार “गलat” कहकर आप उसे सुधारते नहीं, बल्कि उसे खत्म कर देते हैं।
मेरी यह कहानी उन सभी के लिए है जो मेरी तरह घुट रहे हैं। अपनी आवाज को पूरी तरह मरने मत दीजिए। अगर घर में जगह नहीं मिल रही, तो इन पन्नों पर अपनी आवाज ढूँढिए








