भारतीय सिनेमा का गौरवशाली सफर: बॉम्बे टॉकीज से ग्लोबल बॉलीवुड तक

मुंबई: जिसे आज हम दुनिया ‘बॉलीवुड’ के नाम से जानती है, उसका हृदय मुंबई की धड़कनों में बसता है। कभी ‘बॉम्बे सिनेमा’ के नाम से अपनी पहचान बनाने वाला यह फिल्म उद्योग आज केवल मनोरंजन का साधन नहीं, बल्कि भारत की सांस्कृतिक विरासत का एक अभिन्न हिस्सा बन चुका है। निर्मित फिल्मों की संख्या और विविधता के मामले में भारतीय सिनेमा दुनिया के सबसे बड़े फिल्म उद्योगों में शुमार है।
मूक फिल्मों से शुरू हुआ सिलसिला
भारतीय सिनेमा की नींव दादा साहब फाल्के ने रखी थी। साल 1913 में उनकी मूक फिल्म ‘राजा हरिश्चंद्र’ ने पर्दे पर पहली बार भारतीय कहानियों को जीवंत किया। यह भारत की पहली फीचर फिल्म थी, जिसने एक नए युग की शुरुआत की।
इसके बाद आया ध्वनि और संगीत का दौर। साल 1931 में अर्देशिर ईरानी की फिल्म ‘आलम आरा’ ने पर्दे को ‘जुबान’ दी। यह पहली भारतीय सवाक (बोलती) फिल्म थी, जो व्यावसायिक रूप से जबरदस्त सफल रही। इस सफलता ने इंडस्ट्री को ऐसी रफ्तार दी कि 1930 के दशक तक भारत में हर साल 200 से अधिक फिल्मों का निर्माण होने लगा था।

हिंदी सिनेमा का ‘स्वर्ण युग’ (Golden Age)
फिल्म इतिहासकारों के अनुसार, 1940 के दशक के उत्तरार्ध से लेकर 1960 के दशक की शुरुआत तक का समय हिंदी सिनेमा का ‘स्वर्ण युग’ माना जाता है। भारत की स्वतंत्रता के बाद के इस दौर में ऐसी फिल्में बनीं, जिन्होंने न केवल मनोरंजन किया बल्कि समाज को आईना भी दिखाया।
इस कालखंड की कुछ कालजयी फिल्में आज भी सिनेमा प्रेमियों के दिलों में बसी हैं:
- प्यासा (1957) और कागज के फूल (1959): गुरु दत्त की इन फिल्मों ने कला और जीवन के अंतर्विरोधों को गहराई से छुआ।
- आवारा (1951) और श्री 420 (1955): राज कपूर ने सामाजिक विषयों और आम आदमी के संघर्ष को वैश्विक पहचान दिलाई।
- आन (1952): तकनीक और भव्यता के मामले में इस फिल्म ने नए मानक स्थापित किए।

सामाजिक सरोकार और राष्ट्रीय पहचान
हिंदी सिनेमा ने हमेशा से ही भारत की ‘राष्ट्रीय पहचान’ को गढ़ने में बड़ी भूमिका निभाई है। चाहे वह ग्रामीण भारत की समस्याएं हों या शहरी जीवन की चुनौतियां, बॉलीवुड की फिल्मों ने “भारतीय कहानी” को दुनिया के कोने-कोने तक पहुँचाया है। आज यह दक्षिण भारतीय सिनेमा और अन्य क्षेत्रीय फिल्म उद्योगों के साथ कंधे से कंधा मिलाकर भारत को वैश्विक पटल पर गौरवान्वित कर रहा है।
“सिनेमा केवल तकनीक नहीं, बल्कि हमारी भावनाओं और सामाजिक बदलाव का प्रतिबिंब है।”








