अंतरराष्ट्रीय मिंजर मेला: दुकानों के भारी किराए और कम जगह से छोटे व्यापारी बेहाल, SDM दफ्तर के बाहर दिया धरना
* ₹20 हजार के सामान पर 1 लाख रुपये सिक्योरिटी जमा कराने का आरोप; व्यापारियों ने कहा— ‘अगली बार आने से पहले सोचना पड़ेगा’*
चंबा (जितेंद्र मेहरा): अपनी समृद्ध सांस्कृतिक विरासत और भव्यता के लिए देशभर में विख्यात अंतरराष्ट्रीय मिंजर मेला इस बार छोटे व्यापारियों की उपेक्षा और प्रशासनिक अव्यवस्थाओं को लेकर चर्चा में है। मेले में देश के विभिन्न राज्यों से व्यापार करने पहुंचे छोटे कारोबारियों में भारी रोष व्याप्त है। भारी-भरकम सिक्योरिटी राशि, दुकानों के आकार में की गई कटौती और प्रशासनिक रवैये से तंग आकर कई व्यापारी मिंजर मेले के दौरान उपमंडलाधिकारी (SDM) कार्यालय के बाहर धरने पर बैठ गए।
भारी सिक्योरिटी राशि से कमर टूटी
धरना दे रहे व्यापारियों का कहना है कि वे देश और प्रदेश के कई बड़े सांस्कृतिक मेलों में अपनी दुकानें लगाते हैं, लेकिन चंबा के मिंजर मेले जैसी प्रशासनिक दुर्दशा उन्होंने कहीं नहीं देखी।
“हमारे पास कुल 20 हजार रुपये मूल्य का सामान बिक्री के लिए है, लेकिन प्रशासन द्वारा हमसे 1 लाख रुपये तक की भारी सिक्योरिटी राशि जमा कराने की मांग की जा रही है। छोटे कारोबारियों के लिए इतना भारी आर्थिक बोझ उठाना बिल्कुल नामुमकिन है।” > — पीड़ित व्यापारी
दुकानों का आकार घटाने से कारोबार प्रभावित
व्यापारियों ने आरोप लगाया कि आवंटन के समय जो दुकानें उन्हें दिखाई गई थीं, बाद में उनके आकार (साइज) में कटौती कर दी गई। जगह छोटी होने के कारण वे अपना सामान ठीक से सजा भी नहीं पा रहे हैं, जिससे ग्राहकों तक पहुंच बनाना कठिन हो गया है। जगह की कमी का सीधा असर उनके दैनिक कारोबार पर पड़ रहा है।
भविष्य में भाग न लेने की चेतावनी
SDM कार्यालय के बाहर विरोध प्रदर्शन कर रहे व्यापारियों ने प्रशासन से किराए और अन्य शुल्कों की दरों में तत्काल राहत देने की मांग की है। व्यापारियों का कहना है कि यदि प्रशासन शुल्कों का निर्धारण सामान के मूल्य और व्यापारी की क्षमता के अनुसार करे, तो छोटे व्यापारी भी मेले की रौनक का हिस्सा बन पाएंगे। कारोबारियों ने स्पष्ट चेतावनी दी है कि यदि यही स्थिति बनी रही, तो वे आगामी वर्षों में मिंजर मेले में व्यापार करने पर पुनर्विचार करेंगे।
उठे बड़े सवाल
व्यापारियों के इस धरने और विरोध प्रदर्शन के बाद अब मेले के प्रशासनिक प्रबंधन पर कई सवाल खड़े हो रहे हैं:
- आर्थिक संतुलन की कमी: क्या प्रशासन छोटे कारोबारियों की क्षमता को ध्यान में रखकर नीतियां नहीं बना सकता?
- स्थानीय व बाहरी व्यापारियों में असमंजस: क्या मेलों का मकसद केवल राजस्व जुटाना है या छोटे स्वरोजगारियों को प्रोत्साहन देना भी है?
अब देखना यह होगा कि प्रशासन इन पीड़ित कारोबारियों की जायज मांगों पर क्या रुख अपनाता है और क्या आगामी मेलों के लिए व्यवस्था में कोई ठोस बदलाव किए जाते हैं।












