अकाली दल नेता बिक्रम मजीठिया को 5 साल पुराने मामले में अदालत से मिली पेशी से छूट
चंडीगढ़ कोर्ट ने मंजूर की अर्जी, अब 20 अगस्त को होगी अगली सुनवाई
शिरोमणि अकाली दल (SAD) के वरिष्ठ नेता और पूर्व मंत्री बिक्रम सिंह मजीठिया को पांच साल पुराने एक आपराधिक मामले में सोमवार को व्यक्तिगत पेशी से छूट मिल गई। मजीठिया ने अपने वकील राजेश कुमार राय के माध्यम से चंडीगढ़ अदालत में एक आवेदन दायर कर पेशी से छूट की मांग की थी। अदालत ने याचिका को स्वीकार करते हुए मामले की अगली सुनवाई के लिए 20 अगस्त की तारीख तय की है।
अदालत में दायर अर्जी में दलील दी गई कि वकीलों की हड़ताल के कारण उनके कोर्ट रूम में प्रवेश पर प्रतिबंध था, साथ ही पार्टी की एक महत्वपूर्ण बैठक भी प्रस्तावित थी। इसके अलावा, याचिका में बताया गया कि मजीठिया ने इस मामले को रद्द करने (Quashing Petition) के लिए पंजाब एवं हरियाणा उच्च न्यायालय का दरवाजा खटखटाया है, जहां मामला अभी लंबित है।
बचाव पक्ष के वकील ने यह भी तर्क दिया कि इस एफआईआर में नामजद दो सह-आरोपियों के खिलाफ दर्ज मामले को हाईकोर्ट पहले ही रद्द कर चुका है। अर्जी में अदालत को आश्वासन दिया गया कि मजीठिया अगली सुनवाई पर अदालत के समक्ष पेश होंगे और उनकी गैर-मौजूदगी जानबूझकर नहीं, बल्कि परिस्थितियों के कारण थी।
क्या है पूरा मामला?
पुलिस रिकॉर्ड के अनुसार, यह मामला साल 2021 का है। उस समय शिरोमणि अकाली दल के कई वरिष्ठ नेता पंजाब में बढ़ती महंगाई और 1984 के सिख विरोधी दंगों के मुद्दे पर चंडीगढ़ स्थित मुख्यमंत्री आवास का घेराव करने जा रहे थे।
प्रदर्शनकारियों को रोकने के लिए यूटी (केंद्र शासित प्रदेश) पुलिस ने बैरिकेडिंग कर नाकाबंदी की थी। पुलिस का आरोप है कि प्रदर्शनकारियों ने बैरिकेड्स तोड़े, सरकारी आदेशों का उल्लंघन किया और पुलिस के काम में बाधा डाली। इस दौरान पुलिस और प्रदर्शनकारियों के बीच झड़प हो गई, जिसमें कुछ पुलिसकर्मी घायल हो गए थे। जांच पूरी करने के बाद सेक्टर-3 थाना पुलिस ने इस मामले में आरोप पत्र (Chargesheet) दाखिल कर दिया था।
20 से अधिक नेताओं पर दर्ज हुई थी FIR
वर्ष 2021 में सेक्टर-3 थाना पुलिस ने मजीठिया समेत अकाली दल के 20 से अधिक नेताओं के खिलाफ भारतीय दंड संहिता (IPC) की धारा 188, 186, 353, 332 और 34 के तहत मामला दर्ज किया था।
मामले में नामजद अकाली नेता दलजीत सिंह चीमा और महेशइंदर सिंह ग्रेवाल ने अपने खिलाफ दर्ज एफआईआर को रद्द कराने के लिए हाईकोर्ट में याचिका दायर की थी। इसके बाद हाईकोर्ट ने निचली अदालत में आरोप तय (Charge Framing) करने की प्रक्रिया पर रोक लगा दी थी।
29 नवंबर 2025 को हाईकोर्ट ने चीमा और ग्रेवाल की याचिकाओं को स्वीकार करते हुए उनके खिलाफ दर्ज एफआईआर को निरस्त (Quash) कर दिया था। इसके साथ ही जिला अदालत में चल रही कार्यवाही पर लगी रोक भी हट गई थी।











