एम्स बिलासपुर का पहला दीक्षांत समारोह: राष्ट्रपति मुर्मू की मौजूदगी में पारंपरिक लिबास में सजे डॉक्टरों को मिली डिग्रियां
बिलासपुर:अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान (एम्स) बिलासपुर के इतिहास में मंगलवार का दिन एक ऐतिहासिक और स्वर्णिम अध्याय के रूप में दर्ज हो गया। संस्थान के पहले दीक्षांत समारोह में आधुनिक चिकित्सा विज्ञान और देवभूमि हिमाचल की समृद्ध संस्कृति का एक अनूठा संगम देखने को मिला।
मुख्य बातें और आकर्षण:
- गरिमामयी उपस्थिति: देश की राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू ने बतौर मुख्य अतिथि समारोह में शिरकत की और वर्ष 2020 बैच के 89 होनहार चिकित्सकों को डिग्रियां प्रदान कर उनके उज्ज्वल भविष्य की कामना की।
- स्वदेशी परिधान का अनूठा संदेश: समारोह का सबसे बड़ा आकर्षण इसका ड्रेस कोड रहा। पारंपरिक पश्चिमी गाऊन को दरकिनार करते हुए एम्स प्रशासन ने स्वदेशी संस्कृति को बढ़ावा दिया। सभी 89 महिला व पुरुष डॉक्टरों ने एक समान कुर्ता-पायजामा और हिमाचली टोपी पहनकर मंच से डिग्रियां प्राप्त कीं।
- गोल्ड मेडल से सम्मान: चिकित्सा की पढ़ाई में उत्कृष्ट प्रदर्शन करने वाले 5 मेधावी छात्र-छात्राओं को राष्ट्रपति के हाथों प्रतिष्ठित गोल्ड मेडल से नवाजा गया।
- सांस्कृतिक स्वागत और स्मृतिचिह्न: राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू को हिमाचल की लोक संस्कृति से परिचित कराते हुए स्मृतिचिह्न के रूप में पारंपरिक वाद्य यंत्र रणसिंघा, तथा सिद्ध पीठ बाबा बालक नाथ जी और शक्तिपीठ श्री नयना देवी जी की सुंदर प्रतिमाएं भेंट की गईं।
दिग्गजों का जमावड़ा और सुरक्षा व्यवस्था:
समारोह के दौरान मंच पर केंद्रीय स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण मंत्री जेपी नड्डा, राज्यपाल कविन्द्र गुप्ता और मुख्यमंत्री सुखविंदर सिंह सुक्खू सहित कई गण्यमान्य व्यक्ति उपस्थित रहे।
राष्ट्रपति के इस दौरे को लेकर बिलासपुर में सुरक्षा के बेहद कड़े इंतजाम किए गए थे। त्रिस्तरीय सुरक्षा ग्रिड के अंतर्गत 250 से अधिक पुलिस अधिकारियों और जवानों को तैनात किया गया था, जिससे यह ऐतिहासिक आयोजन पूरी तरह सुरक्षित और निर्बाध रूप से संपन्न हुआ।
विशेष टिप्पणी: एम्स बिलासपुर का यह पहला दीक्षांत समारोह न केवल युवा डॉक्टरों के जीवन का एक नया अध्याय है, बल्कि यह देश भर के शैक्षणिक संस्थानों में पश्चिमी परंपराओं को छोड़कर अपनी संस्कृति को अपनाने की दिशा में एक प्रेरणादायक कदम भी बन गया है।











