200 साल तक भारत को तोड़ने वाला यूके खुद टूटने की कगार पर, स्कॉटलैंड, वेल्स और उत्तरी आयरलैंड की बगावत से ब्रिटेन का नक्शा बदलने का खतरा
कभी जिस ब्रिटिश साम्राज्य का सूरज कभी नहीं डूबता था और जिसने करीब दो सौ साल तक भारत पर राज करने के बाद साल 1947 में इसके दो टुकड़े कर दिए थे, वह यूनाइटेड किंगडम (यूके) अब खुद अपने ही घर में टूट की कगार पर पहुंच गया है। सदियों से एक मजबूत राजनीतिक इकाई के रूप में खड़ा यूके इन दिनों अपने ही भीतर उठ रही अलगाव और राष्ट्रवाद की तेज आवाज़ों से घिरता नजर आ रहा है।
हाल ही में कार्डिफ में हुए एक अहम राजनीतिक घटनाक्रम के तहत स्कॉटिश नेशनल पार्टी (SNP), प्लेड कमरी और सिन फेइन के शीर्ष नेताओं ने एक साझा समझौते पर हस्ताक्षर किए हैं। इस ऐतिहासिक समझौते में स्कॉटलैंड के जॉन स्विनी, प्लेड कमरी के नेता रुआन इओरवर्थ, सिन फेइन की अध्यक्ष मैरी लू मैकडोनाल्ड और उत्तरी आयरलैंड की पहली मंत्री मिशेल ओ’नील शामिल हैं। इन नेताओं ने मिलकर तीनों देशों के नागरिकों को अपने संवैधानिक भविष्य का स्वतंत्र फैसला लेने का अधिकार दिए जाने की पुरजोर मांग उठाई है।
तीन देश, तीन अलग रास्ते और जटिल राजनीतिक समीकरण
इस समझौते की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि पहली बार तीन अलग-अलग क्षेत्रों के संवैधानिक सवालों को एक साझा राजनीतिक मंच मिला है। हालांकि, कानूनी और व्यावहारिक नजरिए से तीनों की स्थिति एक-दूसरे से काफी अलग है:
- स्कॉटलैंड: यहाँ के लोग पूरी तरह एक स्वतंत्र देश बनाना चाहते हैं। स्कॉटलैंड साल 2014 में आजादी पर जनमत संग्रह (Referendum) करवा चुका है, जिसमें 55 फीसदी लोगों ने ब्रिटेन में रहने और 45 फीसदी ने आजादी के पक्ष में मतदान किया था। हालांकि, साल 2022 में ब्रिटेन की सुप्रीम कोर्ट ने साफ कर दिया कि स्कॉटिश संसद मौजूदा अधिकारों के तहत एकतरफा दूसरा जनमत संग्रह कराने के लिए कानून नहीं बना सकती। यानी आजादी का रास्ता वेस्टमिंस्टर (ब्रिटिश संसद) की कानूनी व्यवस्था से होकर ही गुजरेगा।
- वेल्स: वेल्स की स्थिति भी स्कॉटलैंड जैसी ही है। वहाँ की संसद को भी ब्रिटेन के साथ अपने संबंधों को एकतरफा खत्म करने का अधिकार नहीं मिला है। कार्डिफ में समझौता होने के बावजूद वेल्स की संसद सीधे तौर पर जनमत संग्रह नहीं करवा सकती। यदि वहाँ आजादी की मांग बढ़ती है, तो अगली बड़ी जंग राजनीतिक समर्थन को कानूनी अधिकार में तब्दील करने की होगी।
- उत्तरी आयरलैंड: इन तीनों में सबसे अलग और स्पष्ट कानूनी रास्ता उत्तरी आयरलैंड के पास है। साल 1998 के ‘गुड फ्राइडे समझौते’ और उत्तरी आयरलैंड अधिनियम के तहत इसकी संवैधानिक स्थिति जनता की सहमति से जुड़ी है। यदि ब्रिटिश सरकार के उत्तरी आयरलैंड सचिव को यह महसूस हो कि जनमत संग्रह में आयरलैंड गणराज्य के साथ एकीकरण के पक्ष में बहुमत मिल सकता है, तो कानूनी प्रक्रिया के तहत वोटिंग करवाई जा सकती है।
अंतरराष्ट्रीय कानून और सवा-निर्णय का अधिकार
स्कॉटलैंड और वेल्स के लिए अंतरराष्ट्रीय कानून का पहलू भी काफी अहम है। संयुक्त राष्ट्र चार्टर और अंतरराष्ट्रीय मानवाधिकार संधियाँ लोगों के स्व-निर्णय के अधिकार को मान्यता तो देती हैं, परंतु इसका अर्थ यह कतई नहीं है कि दुनिया का हर क्षेत्र किसी लोकतांत्रिक देश से अपनी मर्जी से एकतरफा अलग हो जाने का अधिकार रखता है। अंतरराष्ट्रीय अदालत (ICJ) ने कोसोवो मामले में उसकी आजादी के ऐलान को अंतरराष्ट्रीय कानून के खि
लाफ तो नहीं माना था, लेकिन यह भी स्पष्ट नहीं किया कि हर क्षेत्र को स्वतः अलग होने का कानूनी अधिकार है। इसलिए भारी बहुमत से मतदान होने के बावजूद नया देश रातों-रात वजूद में नहीं आ सकता।
अगर तीनों हुए अलग, तो कैसे बदलेगा ब्रिटेन का नक्शा?
यदि भविष्य में ये तीनों क्षेत्र अपनी संवैधानिक प्रक्रियाओं में सफल होते हैं, तो मौजूदा यूनाइटेड किंगडम का ढांचा पूरी तरह धराशायी हो जाएगा:
- स्कॉटलैंड के अलग होने पर: ग्रेट ब्रिटेन का उत्तरी हिस्सा एक स्वतंत्र राज्य बन जाएगा और इंग्लैंड-वेल्स के साथ उसका मौजूदा राजनीतिक संघ खत्म हो जाएगा।
- वेल्स के अलग होने पर: ब्रिटेन का ढांचा और अधिक सिमट जाएगा तथा इंग्लैंड अकेले ब्रिटेन के शेष हिस्से के रूप में बचेगा।
- उत्तरी आयरलैंड के मिलने पर: यूके का आयरिश हिस्सा पूरी तरह समाप्त हो जाएगा और आयरलैंड का एकीकरण हो जाएगा।
इस तरह वजूद में आया था यूनाइटेड किंगडम
- 1707: इंग्लैंड और स्कॉटलैंड की संसदों के ‘यूनियन एक्ट’ के जरिए दोनों का राजनीतिक एकीकरण हुआ और ‘ग्रेट ब्रिटेन’ बना।
- 1801: ग्रेट ब्रिटेन और आयरलैंड के मिलने से ‘यूनाइटेड किंगडम ऑफ ग्रेट Britain and Ireland’ अस्तित्व में आया।
- 1922: आयरलैंड के अधिकांश हिस्से के अलग होने के बाद यूके का वह मौजूदा स्वरूप सामने आया, जिसमें आज इंग्लैंड, स्कॉटलैंड, वेल्स और उत्तरी आयरलैंड शामिल हैं।
भले ही इंग्लैंड, स्कॉटलैंड और वेल्स ‘ग्रेट ब्रिटेन’ का हिस्सा हैं, लेकिन उत्तरी आयरलैंड भौगोलिक रूप से इसका हिस्सा नहीं है। अब देखना यह होगा कि ब्रिटेन की सरकार इन बढ़ती क्षेत्रीय आकांक्षाओं और समझौतों से कैसे निपटती है।










