मौत का दलदल और आस्था की जंग: लुहणू घाट पर मल्लाहों ने महिला को ‘नई जिंदगी’ दी

बिलासपुर : पुण्य कमाने की एक छोटी सी इच्छा कभी-कभी जीवन पर भारी पड़ सकती है। लुहणू घाट के तट पर धार्मिक आस्था के चलते मछलियों को दाना खिलाने पहुंची एक महिला के साथ कुछ ऐसा ही हुआ। जिसे वह पानी का किनारा समझ रही थीं, वह दरअसल मौत का एक गहरा जाल (दलदल) था। देखते ही देखते महिला जमीन में समाने लगी, लेकिन वहां मौजूद कुछ ‘देवदूतों’ की जांबाजी ने अनहोनी को टाल दिया।
जब खामोश जमीन निगलने लगी जिंदगी
हादसा उस वक्त हुआ जब महिला मछलियों को आहार देने के लिए किनारे के बिल्कुल करीब चली गईं। रेतीली सतह के नीचे छिपे खतरनाक दलदल का उन्हें अंदाजा नहीं था। जैसे ही उन्होंने कदम आगे बढ़ाए, दलदल ने उन्हें जकड़ लिया। महिला के शोर मचाते ही वहां अफरा-तफरी मच गई। दलदल इतना गहरा था कि कुछ ही पलों में महिला काफी नीचे धंस गई थीं।
विजय, ओमप्रकाश और कुलदीप बने ‘मसीहा’
इस संकट की घड़ी में स्थानीय बोट चालक विजय चंद और ओमप्रकाश फरिश्ते बनकर सामने आए। उनके साथ होमगार्ड के जवान कुलदीप और अन्य साथियों ने तुरंत मोर्चा संभाला। इन मल्लाहों को इस इलाके की भौगोलिक स्थिति की गहरी समझ है। अपनी जान जोखिम में डालकर उन्होंने सूझबूझ से महिला को सुरक्षित बाहर निकाला। प्रत्यक्षदर्शियों का कहना है कि अगर चंद मिनटों की देरी और होती, तो परिणाम घातक हो सकते थे।
”हमें इस इलाके की नस-नस का पता है। गर्मियों में पानी कम होने से यहां खतरनाक दलदल बन जाता है। जैसे ही हमने शोर सुना, हम बिना सोचे सुरक्षित बचाव के लिए दौड़ पड़े।” — स्थानीय बोट चालक

बेजुबानों के रक्षक, अब इंसानों के भी मददगार
स्थानीय लोगों के अनुसार, इन जांबाज मल्लाहों के लिए यह पहली बार नहीं है। चिलचिलाती गर्मियों में जब गोविंद सागर झील का जलस्तर घटता है, तो तट सूखकर दलदल में तब्दील हो जाते हैं। अक्सर प्यासी गाएं और अन्य जानवर इसमें फंस जाते हैं। दरिया पार के रहने वाले ये मल्लाह अब तक दर्जनों बेजुबानों की जान बचा चुके हैं। आज उनकी इसी बहादुरी ने एक परिवार का चिराग बुझने से बचा लिया।

प्रशासन की चेतावनी:
घाट पर तैनात होमगार्ड्स ने लोगों से अपील की है कि वे पानी के किनारों पर जाते समय अत्यधिक सावधानी बरतें और केवल चिह्नित सुरक्षित स्थानों से ही मछलियों को दाना डालें।








