संघर्ष और साहस: मिसेज वर्ल्ड अदिति गोवित्रिकर ने बयां किया बचपन का ट्रॉमा और बॉलीवुड का कड़वा सच

मुंबई: फिल्म ‘सोच’ (2002) से बॉलीवुड में कदम रखने वाली और साल 2001 में ‘मिसेज वर्ल्ड’ का खिताब जीतकर इतिहास रचने वाली अदिति गोवित्रिकर इन दिनों सुर्खियों में हैं। हाल ही में दिए एक इंटरव्यू में अदिति ने अपने करियर की चुनौतियों और बचपन में हुए शोषण के दर्दनाक अनुभवों को साझा किया है। उन्होंने बताया कि ग्लैमर की चकाचौंध के पीछे का सफर उनके लिए कभी आसान नहीं रहा।

बचपन का वो ‘खौफनाक’ अनुभव
अदिति ने अपने जीवन के एक ऐसे काले अध्याय का खुलासा किया, जिसने उन्हें झकझोर कर रख दिया था। उन्होंने बताया कि जब वे महज 6-7 साल की थीं, तब उनके पिता के एक दोस्त ने उनके साथ बदसलूकी की थी।
”उस उम्र में हुए उस अपमान और असुरक्षा के अहसास ने मुझे गहरा मानसिक आघात (ट्रॉमा) दिया। इन घटनाओं ने मुझे बचपन में ही आत्मरक्षा के तरीके सीखने पर मजबूर कर दिया।”

लोकल ट्रेनों का डर और ‘हार्डबोर्ड’ की ढाल
मुंबई में पढ़ाई के दौरान सुरक्षा की कमी अदिति के लिए एक बड़ी चुनौती थी। उन्होंने बताया कि 12वीं की पढ़ाई के लिए दादर स्थित अग्रवाल क्लासेस जाते समय वे लोकल ट्रेनों के बजाय बस को प्राथमिकता देती थीं, क्योंकि उन्हें ट्रेनें सुरक्षित नहीं लगती थीं।

खुद को सुरक्षित रखने के लिए उन्होंने अनोखे तरीके अपनाए:
- वे हमेशा बड़े बैग साथ रखती थीं।
- बैग में हार्डबोर्ड की भारी किताबें ढाल की तरह इस्तेमाल करती थीं।
- बस में सीट मिलने पर वे दोनों तरफ बैग रखकर खुद को कवर कर लेती थीं ताकि कोई उन्हें छू न सके।
बॉलीवुड में भेदभाव का दर्द
करियर पर बात करते हुए अदिति ने स्वीकार किया कि उन्हें वैसी सफलता और मौके नहीं मिले, जैसे उनकी समकालीन लारा दत्ता और प्रियंका चोपड़ा को मिले। ‘पहेली’ और ‘दे दना दन’ जैसी फिल्मों और ‘बिग बॉस 3’ व ‘खतरों के खिलाड़ी’ जैसे रियलिटी शोज़ का हिस्सा रहने के बावजूद उन्हें इंडस्ट्री में अपनी जगह बनाने के लिए कड़ा संघर्ष करना पड़ा।

निष्कर्ष
अदिति का कहना है कि इन अनुभवों ने उन्हें जीवनभर के लिए सावधान और मजबूत बनाया है। आज वे न केवल एक अभिनेत्री हैं, बल्कि एक क्वालिफाइड डॉक्टर और मनोवैज्ञानिक भी हैं, जो मानसिक स्वास्थ्य के प्रति लोगों को जागरूक कर रही हैं।








