अरनी यूनिवर्सिटी का क्षेत्र बना माइनिंग माफिया का चारागाह, सोता रहा प्रशासन, लुटती रही प्राकृतिक संपदा!”

मंड-इंदौरा: नियमों को ताक पर रखकर, कायदे-कानूनों की धज्जियां उड़ाते हुए व्यास नदी के सीने पर माफिया का ‘पीला पंजा’ दिन-दहाड़े चल रहा है। अरनी यूनिवर्सिटी के पास व्यास नदी में जिस तरह से मशीनों के जरिए अवैध खनन का नंगा नाच हो रहा है, उसने स्थानीय प्रशासन की कार्यप्रणाली पर गंभीर प्रश्नचिन्ह लगा दिए हैं।

दिन के उजाले में लूट, प्रशासन मौन
हैरानी इस बात की है कि जिस व्यास नदी में खनन पर पूर्ण प्रतिबंध है, वहां भारी-भरकम पोकलेन और जेसीबी मशीनें दिन के उजाले में सरेआम नदी का सीना छलनी कर रही हैं। यह सब कुछ प्रशासन की जानकारी में होने के बावजूद किसी भी ठोस कार्रवाई का न होना कई संदेहास्पद सवाल खड़े करता है। क्या प्रशासन ने माफिया के आगे घुटने टेक दिए हैं या फिर इस अवैध कारोबार को सिस्टम का ‘मौन संरक्षण’ प्राप्त है?

बर्बादी की कगार पर किसान और पर्यावरण
स्थानीय ग्रामीणों का गुस्सा सातवें आसमान पर है। लोगों का कहना है कि:
- किसानों की मौत: बेतहाशा खुदाई से नदी की गहराई बढ़ रही है, जिससे किसानों की उपजाऊ जमीनें दरिया में समा रही हैं।
- गिरता जलस्तर: अंधाधुंध माइनिंग से क्षेत्र का भू-जल स्तर खतरनाक स्तर तक गिर चुका है, जिससे आने वाले समय में पीने के पानी का संकट खड़ा होना तय है।
- बदहाल भविष्य: प्राकृतिक स्वरूप नष्ट होने से पारिस्थितिक तंत्र पूरी तरह बिगड़ चुका है।

जिम्मेदारों से सीधे सवाल?
सरेआम चल रहे इस अवैध खेल ने प्रशासन की चुप्पी को कटघरे में खड़ा कर दिया है। ग्रामीण पूछते हैं कि:
- जब खनन प्रतिबंधित है, तो भारी मशीनें दरिया के बीच कैसे पहुंचीं?
- क्या अधिकारियों को दिन के उजाले में हो रही यह माइनिंग दिखाई नहीं देती?
- आखिर माफिया को किसका वरदहस्त प्राप्त है कि वे कानून से बेखौफ हैं?

निष्कर्ष:
अगर प्रशासन की यही सुस्ती और चुप्पी जारी रही, तो व्यास नदी महज एक नाला बनकर रह जाएगी और आसपास के गांवों का अस्तित्व नक्शे से मिट जाएगा। वक्त आ गया है कि जिम्मेदार अधिकारी कुंभकर्णी नींद से जागें और माइनिंग माफिया पर ऐसी कार्रवाई करें जो नजीर बन सके, वरना जनता की इस तबाही की पूरी जिम्मेदारी प्रशासन की होगी।








