महंगाई की डोर से कटी पतंगों की खुशियां: दोगुने हुए दाम, रौनक पर भारी पड़ रहा बजट

त्यौहारों का सीजन दस्तक दे चुका है और बाजारों में चारों ओर रंग-बिरंगी पतंगें और चरखियां सज गई हैं। हालांकि, इस बार आसमान में उड़ती पतंगों की चमक पर महंगाई का साया मंडरा रहा है। बाजार में पतंगों और मांझे की कीमतों में पिछले साल के मुकाबले भारी उछाल आया है, जिससे आम आदमी की जेब पर सीधा असर पड़ा है।
दामों में भारी उछाल: 5 की पतंग हुई 10 की
बाजार सर्वेक्षण के अनुसार, पतंगों की कीमतें इस साल लगभग दोगुनी हो गई हैं। पिछले साल जो साधारण पतंग 5 रुपये में आसानी से उपलब्ध थी, उसकी कीमत अब 10 रुपये हो चुकी है। वहीं, 10 रुपये वाली पतंग अब 20 रुपये में बिक रही है। बच्चों और युवाओं में इसे लेकर निराशा है, क्योंकि उनके लिए पॉकेट मनी के भीतर त्यौहार का आनंद लेना अब चुनौतीपूर्ण होता जा रहा है।

अभिभावकों की चिंता: “खुशियों पर लगा ग्रहण”
बाजार आए कुछ अभिभावकों ने अपनी चिंता व्यक्त करते हुए कहा:
”बच्चों की जिद के आगे झुकना पड़ता है, लेकिन अब त्यौहार मनाना भी बजट से बाहर होता जा रहा है। अगर इसी तरह कीमतें बढ़ती रहीं, तो आम परिवार के लिए ये शौक पूरा करना मुश्किल हो जाएगा।”

दुकानदारों की दलील: मजबूरी में बढ़ाए दाम
जब इस महंगाई के पीछे का कारण दुकानदारों से पूछा गया, तो उन्होंने अपनी बेबसी जाहिर की। विक्रेताओं का कहना है कि:
- कच्चा माल: पतंग बनाने में इस्तेमाल होने वाले कागज और बांस (तीलियों) के दाम बढ़ गए हैं।
- लागत: श्रम लागत (Labour cost) और परिवहन (Transport) खर्च में वृद्धि हुई है।
- दुकानदारों के अनुसार, वे अपना मुनाफा नहीं बढ़ा रहे, बल्कि पीछे से माल महंगा मिलने के कारण मजबूरी में दाम बढ़ा रहे हैं।
विशेषज्ञों की राय: सरकारी हस्तक्षेप जरूरी
बाजार विशेषज्ञों का मानना है कि यदि प्रशासन स्थानीय कारीगरों को सब्सिडी या रियायती दरों पर कच्चा माल उपलब्ध कराए, तो कीमतों पर लगाम लग सकती है। इससे न केवल आम जनता को राहत मिलेगी, बल्कि कुटीर उद्योग से जुड़े कारीगरों को भी प्रोत्साहन मिलेगा।

निष्कर्ष:
पतंगबाजी केवल एक खेल नहीं बल्कि हमारी सांस्कृतिक परंपरा और त्यौहारों की आत्मा है। यदि प्रशासन ने समय रहते कच्चे माल की कीमतों और स्थानीय व्यापार पर ध्यान नहीं दिया, तो डर है कि कहीं यह पारंपरिक उल्लास केवल संपन्न वर्ग तक ही सिमट कर न रह जाए।








