मेरा मन’ में पँथेर नगरी का दर्द: पठानकोट को लेकर नरेश महाजन निरगुन की कविता

जल स्रोत विभाग के वरिष्ठ अधिकारी और प्रसिद्ध शायर नरेश महाजन ‘निरगुन’ ने पठानकोट शहर की विकास यात्रा और उसकी वर्तमान स्थिति को अपनी कविता के माध्यम से मार्मिक ढंग से बयाँ किया है।
मेरा मन
मेरे शहर के
चुनाव जीते हुये नेता की तरह
सोचता है कि
जीतना पाप हो जैसे
हारने वाला भी नवाजा गया ऐसे
कि तुम से ‘आप’ हो जैसे
फिर सोचता हुॅ कि
मेरी सोच भी कभी कभी
मेरे शहर की कोरपोरेशन की तरह
भरी जवानी में बुढ़िया हो जाने जैसी लगती है
मिला कोई श्राप हो जैसे
यूँ तो इस शहर में हर कोई
मेरे प्रदर्शनकारी मन जैसा
इक चौधरी सा लगता है
मगर ये शहर फिर भी लावारिस दिखाई देता है
भोगता कोई सन्ताप हो जैसे
नरेश महाजन ‘निरगुन
पठानकोट की नींव ‘चुने हुए’ और ‘खुद का विकास करने’ वालों ने रखी, जिससे यह ‘सबका’ शहर नहीं बन पाया है।
‘मेरा मन’ की शृंखला में व्यक्त दर्द
’निरगुन’ ने अपनी बहुचर्चित कविता शृंखला ‘मेरा मन’ में इस मुद्दे को उठाते हुए शहर के हालातों को दर्शाया है। उन्होंने कहा कि जिन्हें शहर ने अपना विधायक (MLA) चुना, उनकी डूबने में पार्टी ने पंजाब में सरकार बना ली। लेकिन उनका कायदा ऐसा रहा कि शहर की कार्यप्रणाली शुरू से ही ‘तरस लायक’ है।
‘हारने वाला’ नेता और ‘कोरपोरेशन’ की तरह शहर
कवि ‘निरगुन’ अपनी रचना में लिखते हैं कि उनका मन शहर के चुनाव जीतने वाले नेता की तरह सोचता है। वह खुद को उस व्यक्ति की तरह महसूस करते हैं, जिसे ‘जीतना चाव हो जैसे’ मगर ‘हारने वाला’ मानकर नवाजा गया हो, बिल्कुल वैसे जैसे किसी को ‘तुम से ‘आप’ हो जैसे’ कहा जाए।

विरोध के बावजूद आशा की लौ
’निरगुन’ ने यह भी दर्शाया कि पठानकोट शहर की यह दुखद स्थिति अब हर कोई महसूस कर रहा है।

शायर नरेश महाजन ‘निरगुन’ की यह कविता पठानकोट के निवासियों के अंदर दबे हुए दर्द और विकास की अनदेखी की ओर एक शक्तिशाली संकेत है, जो शहर के राजनीतिक और प्रशासनिक तंत्र पर एक विचारोत्तेजक टिप्पणी करती है ।








