डेंगू का साया: लुधियाना में सरकारी आंकड़ा 400 पार, मौतें जांच के नाम पर गुमनाम!

लुधियाना (सहगल): जिले में डेंगू के मरीजों की संख्या ने चिंताजनक स्तर पार कर लिया है। सरकारी आंकड़ों के अनुसार, मरीजों का आंकड़ा 400 को पार कर चुका है, हालांकि ज़मीनी हकीकत इससे कहीं अधिक गंभीर बताई जा रही है।
सबसे बड़ा सवाल डेंगू से होने वाली मौतों को लेकर है। स्वास्थ्य विभाग ने इस संबंध में चुप्पी साध रखी है। विभाग का कहना है कि हेड ऑफिस के आदेश के तहत हर मौत की फाइल की डेंगू डेथ रिव्यू कमेटी जांच करेगी और पुष्टि करेगी कि मौत डेंगू से हुई है या किसी अन्य कारण से।
जांच के पीछे का सच?
यह कोई नई बात नहीं है। सूत्रों का कहना है कि अतीत में भी कई डेंगू मौतों को स्वास्थ्य विभाग द्वारा किसी अन्य बीमारी से जोड़कर दर्ज किया गया है।
डॉक्टरों की राय को अनदेखा: इलाज करने वाले डॉक्टर की ओपिनियन को अक्सर नज़रअंदाज़ किया जाता है।
लैब रिपोर्टों पर सवाल: अगर लैब रिपोर्ट में डेंगू पॉजिटिव आता भी है, तो सिविल अस्पताल में क्रॉस चेकिंग के नाम पर रिपोर्टों को ही गलत साबित कर दिया जाता है।
सवाल यह उठता है कि यदि डायग्नोसिस या लैब रिपोर्ट गलत थी, तो सम्बंधित डॉक्टर या लैब कर्मियों पर कार्रवाई क्यों नहीं होती? यह सिलसिला वर्षों से जारी है।

कहा जा रहा है कि ऐसा इसलिए किया जाता है ताकि डेंगू को महामारी घोषित न करना पड़े और सरकार को मुआवजा राशि देने से बचा जा सके।
संदिग्ध मरीजों की रिपोर्टों पर पर्दा
स्थानीय अस्पतालों में बड़ी संख्या में डेंगू के संदिग्ध मरीज सामने आ रहे हैं, लेकिन स्वास्थ्य विभाग लगातार अपनी गिनती को कम बताता रहा है।
अधिकांश मरीजों को ‘संदिग्ध’ श्रेणी में रखा जाता है।
इन संदिग्ध मरीजों की सूचना को स्वास्थ्य विभाग सार्वजनिक नहीं करता।
दिलचस्प बात यह है कि इन्हीं मरीजों को अस्पताल के रिकॉर्ड में पॉजिटिव ही दर्शाया जाता है।
अस्पतालों द्वारा गलत इलाज या रिपोर्ट बनाने पर भी कार्रवाई शून्य है।

मरीजों की लूट और सरकार की अनदेखी 💸
डेंगू का इलाज करा रहे मरीजों और उनके परिवारों ने अस्पतालों द्वारा की जा रही लूट पर गंभीर चिंता जताई है।
सार्वजनिक प्रदर्शन की मांग: लोगों की मांग है कि सरकार हर अस्पताल के लिए डेंगू के इलाज की निर्धारित दरें सार्वजनिक तौर पर डिस्प्ले करने का निर्देश जारी करे।
भारी अंतर: निजी और कॉर्पोरेट अस्पतालों में सरकार द्वारा निर्धारित दरों और वसूले जा रहे रेटों में भारी अंतर है, जिसका सीधा बोझ मरीजों पर पड़ रहा है।
कार्रवाई शून्य: लोगों का आरोप है कि सरकार लोगों के हितों का ध्यान नहीं रख रही है। आज तक किसी अस्पताल के विरुद्ध कार्रवाई तो दूर, एक शो-कॉज़ नोटिस तक जारी नहीं हुआ है।
सवाल: मरीज के इलाज के नाम पर ज़्यादा पैसे क्यों वसूले जा रहे हैं?








