रावी दरिया किनारे बसे सीमावर्ती गांवों पर बाढ़ का साया: ड्रेनेज विभाग के अधूरे प्रबंधों से सहमे लोग

हिमाचल प्रदेश और जम्मू-कश्मीर के पहाड़ी इलाकों में हो रही मूसलाधार बारिश और बादल फटने की घटनाओं ने सीमावर्ती जिला गुरदासपुर और पठानकोट के लोगों की रातों की नींद उड़ा दी है। रावी दरिया में कब पानी का स्तर जानलेवा रूप अख्तियार कर ले, इसका कोई अंदाजा नहीं लगा सकता। कई बार तो रात के समय ही पानी का बहाव इतना बढ़ जाता है कि किनारे बसे दर्जनों गांवों को भारी मुश्किलों का सामना करना पड़ता है। लेकिन इन सबके बावजूद ड्रेनेज विभाग द्वारा बाढ़ से निपटने के पुख्ता इंतजाम न किए जाने से सीमा पर बसे गांवों के लोग खौफ के साए में जीने को मजबूर हैं।
जैनीपुर के पास खतरनाक हो जाता है रावी का रूप
रावी दरिया हिमाचल प्रदेश से रंजीत सागर डैम और शाहपुर कंडी डैम से होते हुए माधोपुर हैडवर्क्स के रास्ते पठानकोट और गुरदासपुर की सीमा में प्रवेश करता है। जब यह पठानकोट के जैनीपुर पहुंचता है, तो इसमें जम्मू-कश्मीर से आने वाला उज्ज दरिया और शिंगारवां समेत कई स्थानीय नाले मिल जाते हैं। इसके बाद गुरदासपुर में प्रवेश करते ही पानी का बहाव इतना तेज और विशाल हो जाता है कि स्थिति बेकाबू होने लगती है। विभाग द्वारा जैनीपुर में बनाए गए बाढ़ सुरक्षा प्रबंध पानी के तेज बहाव के आगे तिनके की तरह बह जाते हैं। मकोड़ा पत्तन के पास स्थिति इतनी विकराल हो जाती है कि बाढ़ के समय वहां किश्ती उतारना भी मौत को दावत देने जैसा है।
मंजूरी के बावजूद फाइलों में दबा 400 करोड़ का जैनीपुर डैम प्रोजेक्ट
भारत सरकार ने रावी का पानी पाकिस्तान जाने से रोकने के लिए रंजीत सागर और शाहपुर कंडी डैम (जिसकी झील में पानी भरने का काम शुरू हो चुका है) तो बना दिए, लेकिन बरसात के पानी और स्थानीय नालों को रोकने के लिए जैनीपुर के पास 400 करोड़ रुपये की लागत से एक अन्य डैम की योजना तैयार की गई थी। इस डैम से पानी रुकने के साथ-साथ दरिया पार के गांवों के लिए सड़क संपर्क भी बनना था। हैरानी की बात यह है कि सभी मंजूरियां मिलने के बावजूद पिछले कई सालों से इस डैम का काम शुरू नहीं हो सका है, जिससे लोगों में भारी रोष है।
ढलान और पाकिस्तान की चालें बढ़ा रहीं भारतीय क्षेत्र की मुसीबत
रावी दरिया में आई बाढ़ को रोकने के लिए बनाया गया विशाल धुस्सी बांध भी अब नाकाफी साबित हो रहा है। किसानों और गुज्जरों द्वारा अपने खेतों में जाने के लिए धुस्सी बांध पर से बनाए गए अवैध रास्तों के कारण बाढ़ के समय यह बांध कमजोर होकर टूट जाता है।

इसके अलावा, इसके पीछे भौगोलिक और कूटनीतिक कारण भी हैं:
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- ढलान का नुकसान: पाकिस्तान का इलाका ऊंचाई पर है और भारतीय क्षेत्र ढलान पर है, जिससे पानी का पूरा दबाव भारतीय सीमा की तरफ रहता है।
- पाकिस्तान का हाजीपुर गुजरांवाला बांध: पाकिस्तान ने भारतीय धुस्सी बांध के मुकाबले अपना ‘हाजीपुर गुजरांवाला धुस्सी बांध’ मजबूत कर रखा है, जिससे पानी भारत की तरफ मुड़ जाता है।
- पाकिस्तानी नाले का परमानेंट रूट: सालों पहले पाकिस्तान ने चालाकी से भारतीय क्षेत्र की तरफ एक नाला खोदा था, जो अब रावी दरिया का स्थायी रास्ता बन चुका है। इसके कारण रावी अब अपने पुराने बहाव क्षेत्र से करीब 3-4 किलोमीटर अंदर भारतीय इलाके में बह रही है।
बॉक्स: ‘सोने की खान’ बना धुस्सी बांध, बन सकती थी लोहे की दीवार!
स्थानीय लोगों और विशेषज्ञों का आरोप है कि सरकार ने धुस्सी बांध की मरम्मत और स्टड-स्पर (Studs & Spurs) बनाने के नाम पर अब तक बेतहाशा पैसा बहाया है। हर साल बाढ़ में ये स्टड टूट जाते हैं और विभाग के लिए यह ‘सोने की खान’ बन जाता है। लोगों का कहना है कि जितना पैसा अब तक इस बांध पर खर्च किया जा चुका है, उतने में तो दरिया के किनारे लोहे की पक्की दीवार खड़ी की जा सकती थी।

भारत-पाक समझौते के फेर में थमे पक्के प्रबंध
दोनों देशों के बीच हुए एक पुराने समझौते के मुताबिक, अब भारत और पाकिस्तान धुस्सी बांध पर किसी भी तरह के बड़े या नए बाढ़ सुरक्षा प्रबंधों का निर्माण नहीं कर सकते। सालों तक एक-दूसरे की तरफ पानी मोड़ने के लिए करोड़ों रुपये बहाने के बाद दोनों देशों ने सहमति बनाई थी कि यहां केवल बहुत जरूरी और सीमित बाढ़ सुरक्षा कार्य ही किए जाएंगे। इस समझौते के कारण भी भारतीय प्रशासन हाथ पर हाथ धरे बैठा है।
ग्रामीणों की पुकार: “हम हर साल अपनी बर्बादी अपनी आंखों से देखते हैं। मानसून आते ही हमारे घरों में डर का माहौल हो जाता है। सरकार से मांग है कि राजनीति और कागजी कार्रवाई छोड़ समय रहते रावी किनारे पुख्ता इंतजाम किए जाएं, ताकि हमारी जान-माल सुरक्षित रह सके।”








