AMI News: पठानकोट में ऑटो चालकों और रैपिडो बाइक राइडर्स के बीच विवाद गहराया, गुंडागर्दी के आरोप

पठानकोट: स्थानीय शहर में रोजगार की तलाश और सवारियों को बेहतर सुविधा देने का दावा करने वाले ऑटो चालकों और रैपिडो (Rapido) बाइक राइडर्स के बीच का मतभेद अब एक गंभीर और चिंताजनक विषय बनता जा रहा है। दोनों ही पक्ष अपने रोजगार के लिए काम कर रहे हैं, लेकिन पठानकोट में इनके बीच बढ़ता टकराव अब सरेआम विवाद और गुंडागर्दी का रूप लेता जा रहा है।
अकेले पाकर घेरने और चाबी छीनने के आरोप
रैपिडो चालकों का आरोप है कि जब भी वे किसी सवारी को लेने रेलवे स्टेशन, बस स्टैंड या चक्की पुल जैसे मुख्य स्थानों पर जाते हैं, तो वहां मौजूद ऑटो चालक संघ के लोग उन्हें अकेले देखकर घेर लेते हैं।
एक पीड़ित रैपिडो चालक ने अपना अनुभव साझा करते हुए बताया, “एक बार जब मैं रेलवे स्टेशन से एक सवारी का सामान लेकर उसे बैठा रहा था, तब ऑटो यूनियन के करीब 40-50 लोगों ने मुझे चारों तरफ से घेर लिया। जब हमने इस संबंध में रैपिडो कंपनी के सपोर्ट सिस्टम से बात की, तो वहां से भी कोई ठोस मदद नहीं मिली। उल्टा हमें यह कहा गया कि सवारी को फोन करके बाहर बुला लिया करो। अब आप ही बताइए, रेलवे स्टेशन पर उतरने वाली सवारी जिसके पास भारी सामान (लगेज) होता है, वह बाहर तक कैसे आ सकती है? हमें तो अंदर जाना ही पड़ेगा।”
पीड़ित चालकों ने यह भी आरोप लगाया कि ऑटो चालक उनके साथ गाली-गलौज और बहस करते हैं और जबरन उनकी बाइक की चाबी तक निकाल लेते हैं। चालकों का कहना है कि कानूनन एक आईपीएस अधिकारी को भी इस तरह चाबी छीनने का अधिकार नहीं है, लेकिन यहाँ सरेआम नियमों की धज्जियाँ उड़ाई जा रही हैं।

कंपनी की बेरुखी से बढ़े परेशान
रैपिडो चालकों का कहना है कि वे इस समस्या को लेकर पिछले एक साल से मानसिक तनाव और दिक्कतों का सामना कर रहे हैं। जब इस विषय में रैपिडो कंपनी को लिखित या मौखिक शिकायत दी जाती है, तो कंपनी की तरफ से हर बार यही आश्वासन मिलता है कि ‘जल्द ही समाधान निकाला जाएगा’। लेकिन एक साल बीत जाने के बाद भी कंपनी की तरफ से राइडर्स की सुरक्षा और सहयोग के लिए कोई ठोस कदम नहीं उठाया गया है।
पार्सल बुकिंग और लंबे रूट की भी हैं अपनी समस्याएं
चालकों ने बताया कि केवल सवारियां ही नहीं, बल्कि ऐप के जरिए पार्सल भेजने वाले ग्राहकों के कारण भी वे असमंजस और डर के साये में रहते हैं। पार्सल के अंदर क्या सामान है, इसकी वे जांच नहीं कर पाते, जिससे हमेशा एक जोखिम बना रहता है।

इसके अलावा, चालकों ने लंबे रूट (जैसे ममुन, डमटाल, पंगोली या सुजानपुर) पर आने वाली व्यावहारिक दिक्कतों का भी जिक्र किया। उनका कहना है कि शहर के भीतर तो तुरंत दूसरी राइड मिल जाती है, लेकिन लंबे रूट पर सवारी छोड़ने के बाद उन्हें खाली हाथ वापस लौटना पड़ता है। ग्राहक केवल एक तरफ का ही किराया देता है, जिससे चालकों को आर्थिक नुकसान होता है। चालकों ने मांग की है कि कंपनी को ऐसे लंबे रूट्स के किराए में बढ़ोतरी करनी चाहिए।
प्रशासन से दखल की मांग
पठानकोट की जनता को हर मौसम—चाहे तेज धूप हो या बारिश—अपनी सेवाएं देने वाले इन डिजिटल चालकों की सुरक्षा पर अब बड़े सवाल खड़े हो रहे हैं। चालकों का कहना है कि वे भी प्रशासन के नियमों के तहत ही काम करना चाहते हैं, लेकिन ऑटो चालकों द्वारा की जा रही इस कथित दादागिरी और ट्रैफिक की समस्याओं के बीच उनके लिए सुरक्षित काम करना मुश्किल होता जा रहा है। अब देखना यह होगा कि स्थानीय पुलिस और प्रशासन इस बढ़ते विवाद को सुलझाने के लिए क्या कदम उठाता है।








