अश्विनी शर्मा के कार्यालय के बाहर फूका ट्रंप और मोदी का पुतला, किसानों ने दी उग्र आंदोलन की चेतावनी

पठानकोट: स्थानीय पटेल चौक स्थित भाजपा के प्रदेश अध्यक्ष अश्विनी शर्मा के कार्यालय के बाहर आज किसानों द्वारा केंद्र की मोदी सरकार और पंजाब सरकार के खिलाफ जमकर नारेबाजी की गई। किसान मजदूर संघर्ष कमेटी पंजाब के नेतृत्व में एकत्रित हुए दर्जनों किसानों ने भारत-अमेरिका के बीच होने वाले ‘फ्री ट्रेड डील’ (मुक्त व्यापार समझौते) के विरोध में जमकर आक्रोश व्यक्त किया और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी व अमेरिकी राष्ट्रपति का पुतला भी फूंका।
क्या है किसानों के विरोध का मुख्य कारण?
किसान मजदूर संघर्ष कमेटी के सूबा कोर कमेटी सदस्य लखविंदर सिंह वरयाम नंगल ने बताया कि पिछले दिनों ग्वालियर (मध्य प्रदेश) में किसान मजदूर मोर्चा (केएमएम) की एक राष्ट्रीय स्तर की बैठक आयोजित की गई थी। इस बैठक में बिहार, उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश, राजस्थान, हरियाणा, पंजाब और केरल सहित देश के कई राज्यों के किसान संगठनों ने भाग लिया।
लखविंदर सिंह ने आरोप लगाया कि:
”भारत और अमेरिका के बीच ‘फ्री डील’ के नाम पर जो समझौता होने जा रहा है, उसके तहत अमेरिका से आने वाले तमाम खाद्य पदार्थों और राशन पर कोई टैक्स नहीं लगेगा। टैक्स फ्री होने के कारण यह सामान भारतीय बाजारों में बेहद सस्ते दामों पर बिकेगा। इसका सीधा और घातक असर देश के उन ८०% लोगों पर पड़ेगा जिनकी आजीविका पूरी तरह से कृषि पर निर्भर है”।

देश की अर्थव्यवस्था और हर वर्ग होगा प्रभावित
किसानों का कहना है कि भारत एक कृषि प्रधान देश है, जहाँ ८०% आमदनी खेती से, १५% नौकरीपेशा से और ५% अन्य माध्यमों से आती है। अगर विदेशी अनाज बिना टैक्स के भारत में डंप किया गया, तो देश की खेती पूरी तरह से बर्बाद हो जाएगी। जब किसानों की फसल बिकेगी ही नहीं, तो देश का पूरा बाजार ठप हो जाएगा। इसका असर सीमेंट, सरिया, ईंट-भट्ठों से लेकर राजमिस्त्री और दिहाड़ी मजदूरों तक पर पड़ेगा, जिससे देश में बेरोजगारी चरम पर पहुंच जाएगी।

आर-पार की लड़ाई का ऐलान
किसान नेताओं ने स्पष्ट किया कि आज का यह प्रदर्शन केवल एक ‘संकेत’ (प्रतीकात्मक विरोध) था, जिसके तहत देश के विभिन्न राज्यों में भाजपा के बड़े नेताओं के घरों और दफ्तरों के बाहर पुतले फूंके गए हैं। किसानों ने मांग की है कि अमेरिका के साथ की जा रही इस ‘फ्री डील’ को तुरंत वापस लिया जाए। यदि सरकार ने इस समझौते को रद्द नहीं किया, तो आने वाले दिनों में किसान अपने अस्तित्व और आने वाली पीढ़ियों को बचाने के लिए किसी भी हद तक जाने को तैयार हैं और आंदोलन को बेहद उग्र व रौद्र रूप दिया जाएगा।








