कांगड़ा घाटी रेलवे: सिर्फ दो जोड़ी ट्रेनों के भरोसे लाखों यात्री, सुरक्षा ताक पर; सभी 7 जोड़ी ट्रेनें बहाल करने की मांग

पठानकोट: पठानकोट-बैजनाथ ऐतिहासिक नैरो-गेज रेल मार्ग पर ट्रेनों की पूरी बहाली न होने से स्थानीय यात्रियों और दैनिक यात्रियों में भारी रोष है। एक प्रमुख यात्री संगठन और कांगड़ा घाटी के स्थानीय निवासियों ने रेल मंत्री अश्विनी वैष्णव से इस रूट पर केवल दो जोड़ी ट्रेनों के बजाय पहले की तरह सभी सात जोड़ी ट्रेनों को तुरंत बहाल करने का आग्रह किया है। यात्रियों का कहना है कि ट्रेनों की कमी के कारण रोजाना भारी भीड़ उमड़ रही है, जिससे लोग जान जोखिम में डालकर असुरक्षित सफर करने को मजबूर हैं।
चार साल बाद शुरू हुई सेवा, पर उम्मीदें टूटीं
गौरतलब है कि अगस्त 2022 में हिमाचल प्रदेश में आई विनाशकारी बाढ़ और भूस्खलन के कारण चक्की नदी पर बना ब्रिटिश काल का ऐतिहासिक पुल संख्या 32 बह गया था। ट्रैक को हुए व्यापक नुकसान के कारण इस 164 किलोमीटर लंबी लाइन पर परिचालन लगभग चार साल तक बंद रहा।
बीती 2 जून को पूर्व केंद्रीय मंत्री और सांसद अनुराग ठाकुर ने दो ट्रेनों को हरी झंडी दिखाकर सेवा की दोबारा शुरुआत की थी। इसके अगले ही दिन पठानकोट और नूरपुर के बीच तीसरी ट्रेन भी बहाल की गई, जिससे लोगों में उम्मीद जगी थी। लेकिन महज एक हफ्ते बाद, 10 जून को उत्तर रेलवे ने ‘परिचालन बाधाओं’ और रखरखाव का हवाला देकर इस तीसरी ट्रेन को अचानक रद्द कर दिया।
दरवाजों पर लटककर सफर करने को मजबूर यात्री
“वर्तमान में चल रही दो ट्रेनों में अत्यधिक भीड़ होती है। चूंकि यह नैरो-गेज ट्रैक है, इसलिए प्रत्येक ट्रेन में केवल छह कोच होते हैं। भारी भीड़ के कारण यात्री कोच के दरवाजों पर खड़े होकर यात्रा करने को मजबूर हैं, जिससे कभी भी बड़ा हादसा हो सकता है।” > – पी सी विश्वकर्मा, अध्यक्ष (कांगड़ा घाटी रेलवे संघर्ष समिति)
विश्वकर्मा ने आरोप लगाया कि जम्मू मंडल और रेलवे बोर्ड के वरिष्ठ अधिकारी शेष पांच जोड़ी ट्रेनों को बहाल करने के सवाल पर पूरी तरह चुप्पी साधे हुए हैं।
समय सारणी से भी बढ़ी मुसीबतें
स्थानीय लोगों के अनुसार, वर्तमान में चल रही दोनों ट्रेनों के प्रस्थान का समय बेहद असुविधाजनक है:
- पठानकोट से रवानगी: पहली ट्रेन सुबह 5:00 बजे और दूसरी सुबह 7:00 बजे चलती है, जो दोपहर में बैजनाथ पपरोला पहुंचती हैं।
- बैजनाथ से वापसी: एक ट्रेन दोपहर 2:00 बजे और दूसरी दोपहर 3:30 बजे रवाना होती है, जो रात को लगभग 9:00 बजे और 11:00 बजे पठानकोट पहुंचती हैं। इस समय सारणी से दैनिक यात्रियों (स्कूली बच्चों, कर्मचारियों और मरीजों) को कोई फायदा नहीं मिल पा रहा है।

देरी के पीछे राजनीति या स्टाफ की कमी?
जहां एक तरफ रेलवे प्रशासन परिचालन बाधाओं और ट्रैक मेंटेनेंस का हवाला दे रहा है, वहीं दूसरी तरफ स्थानीय लोग इसे प्रशासनिक नाकामी और राजनीति से जोड़कर देख रहे हैं।
- स्टाफ की कमी: पठानकोट के एक वरिष्ठ नागरिक के अनुसार, रेलवे अधिकारियों ने अनौपचारिक रूप से स्वीकार किया है कि लोको पायलटों (ड्राइवरों) और अन्य क्रू स्टाफ की भारी कमी इस देरी की मुख्य वजह है।
- स्थानीय राजनीति का साया: संघर्ष समिति के अध्यक्ष विश्वकर्मा ने एक गंभीर आरोप लगाते हुए कहा कि पठानकोट के कुछ प्रभावशाली राजनेता सभी ट्रेन सेवाओं को बहाल करने का विरोध कर रहे हैं। उनका तर्क है कि ट्रेनें आने पर शहर के 4-5 समपार फाटक (लेवल क्रॉसिंग) बंद हो जाते हैं, जिससे सड़क यातायात प्रभावित होता है।

रेलवे अधिकारियों का पक्ष
इस पूरे मामले पर रेलवे अधिकारियों का कहना है, “मानसून और बाढ़ के कारण ट्रैक को भारी नुकसान पहुंचा था, जिसे सुरक्षा कारणों से बंद करना पड़ा था। हमने चरणबद्ध तरीके से काम शुरू किया है और दो ट्रेनें बहाल कर दी हैं। अन्य ट्रेनों को भी जल्द ही चरणबद्ध तरीके से शुरू किया जाएगा।”
फिलहाल, 20 कस्बों की लाइफलाइन मानी जाने वाली इस रेलवे लाइन के पूरी तरह सुचारू न होने से कांगड़ा घाटी के लोगों का दैनिक जीवन बेपटरी हो चुका है।








