गिरिपार में सप्ताहभर मनाई जाती है दीपावली , बुड़ेछू नृत्य, बैल पूजन व सास-दामाद दूज रहे आकर्षण का केंद्र

सिरमौर :(कपिल शर्मा) 21 अक्टूबर
,गिरिपार क्षेत्र में दीपावली का पर्व इस वर्ष भी पारंपरिक उत्साह और लोक संस्कृति के रंगों के साथ सप्ताहभर तक मनाया जा रहा है। सदियों पुरानी परंपराओं को सहेजे रखने वाला यह पर्व रविवार की चौदश से प्रारंभ होकर अवांस, पोड़ोई, दूज, तीज, चौथ और पंचमी तक चलता है।

इस अवसर पर विशेष समुदाय के लोक कलाकारों द्वारा पारंपरिक ‘बुड़ेछू नृत्य’ प्रस्तुत किया जाता है, जो दीपावली और बूढ़ी दिवाली के दौरान ही होता है। कलाकार पारंपरिक ‘चौलणा’ परिधान धारण कर तेज लय वाले सिरमौरी गीतों पर नृत्य करते हैं तथा होकू, सिंघा वजीर, चाय गीत, नतीराम और जगदेव जैसी वीरगाथाएं गाकर स्थानीय लोकसंगीत की विरासत को जीवित रखते हैं।

दीपावली के अवसर पर घर-घर में अस्कली, धोरोटी, पटांडे, सीड़ो, तेलपकी और मूड़ा जैसे पारंपरिक व्यंजन तैयार किए जाते हैं। लोक कलाकारों और मेहमानों के सत्कार की परंपरा को ‘ठिल्ला’ कहा जाता है, जिसके तहत घी से बने व्यंजन परोसे जाते हैं।
दिवाली के अगले दिन पोड़ोई पर गौवंश विशेषकर बैलों की पूजा की जाती है। वहीं भैया दूज पर दामाद अपनी सास को 100 अखरोट और मूड़ा भेंट स्वरूप प्रदान कर उनका आशीर्वाद प्राप्त करते हैं — यह परंपरा आज भी पूरे आदर और श्रद्धा से निभाई जाती है।
गिरिपार क्षेत्र के संगड़ाह, शिलाई, कफोटा और राजगढ़ उपमंडलों की लगभग 154 पंचायतों में दीपावली इसी पारंपरिक शैली में मनाई जाती है। पहले यहां बिना पटाखों के, केवल हुशू (दीप ज्योति) और मिट्टी के दीयों से ईको-फ्रेंडली ढंग से दीपावली मनाई जाती थी।

दीपावली के एक माह बाद इस क्षेत्र में बूढ़ी दिवाली अथवा ‘मशराली’ भी उतनी ही धूमधाम से मनाई जाती है। इस दौरान भी लोकनृत्य, सांस्कृतिक संध्याएं और लोकगाथाओं का गायन उत्सव की शोभा बढ़ाते हैं। गिरिपार क्षेत्र में दीपावली के साथ-साथ लोहड़ी, गूगा नवमी, ऋषि पंचमी और वैशाखी जैसे त्यौहार भी देश के अन्य भागों से अलग पारंपरिक रंग-रूप में मनाए जाते हैं। यहां की समृद्ध लोक संस्कृति और जीवंत परंपराएं सिरमौर को हिमाचल का ‘लोकसंस्कृति केंद्र’ बनाती हैं।








