डॉ. के. डी. सिंह का अनुभव: सादगी और निश्छलता में ही होता है ईश्वर का वास

पठानकोट:अक्सर डॉक्टर मरीजों की शारीरिक बीमारियों का इलाज करते हैं, लेकिन कभी-कभी कुछ मरीज डॉक्टर के अंतर्मन को ही उपचार दे जाते हैं। ऐसा ही एक मार्मिक अनुभव साझा किया है प्रसिद्ध चिकित्सक डॉ. के. डी. सिंह ने। उन्होंने बताया कि कैसे एक विशेष बच्ची की मासूमियत ने उन्हें जीवन के सबसे गहरे दर्शन से रूबरू करवाया।
वो स्पर्श जो रूह तक उतर गया
डॉ. सिंह के अनुसार, क्लिनिक में आँखों की जाँच के दौरान एक विशेष बच्ची से उनकी मुलाकात हुई। जाँच के बाद जब उन्होंने स्नेहवश उसे एक छोटी सी गेंद उपहार में दी, तो बच्ची की प्रतिक्रिया ने उन्हें स्तब्ध कर दिया। उस मासूम ने जिस आत्मीयता और शुद्धता के साथ डॉक्टर साहब को गले लगाया, वह प्रेम शब्दों में बयान करना नामुमकिन था। डॉ. सिंह कहते हैं कि उसके चेहरे पर झलकती वह करुणा यह सोचने पर मजबूर कर देती है कि समय और उम्र के साथ हम इंसान कितने बदल जाते हैं।

निर्मल मन ही सबसे श्रेष्ठ
लेख में डॉ. के. डी. सिंह ने समाज की सोच पर भी गहरा कटाक्ष किया है। उन्होंने कहा, “दुनिया जिसे ‘मानसिक रूप से कमजोर’ कहती है, वास्तव में उसका मन ही सबसे अधिक निर्मल और स्वच्छ है। वह श्रेष्ठ है क्योंकि वह दुनियावी छल-कपट और चालाकी की जटिलताओं से कोसों दूर है।”
भीतर के बच्चे को बचाना जरूरी
डॉक्टर साहब ने समाज को संदेश देते हुए कहा कि ईश्वर हमें सात्विकता और पवित्रता से भरकर भेजता है, लेकिन दुनिया की भागदौड़ में हम अपना असली स्वभाव खो देते हैं। आज जरूरत है कि हम बड़े होकर भी अपने भीतर के उस मासूम बच्चे को जीवित रखें। यदि हमारा मन सहानुभूति, सहिष्णुता और असीम प्रेम से भरा रहे, तभी हम सच्चे अर्थों में इंसान कहलाएंगे।

निष्कर्ष
डॉ. के. डी. सिंह का यह अनुभव हमें याद दिलाता है कि आँखों की रोशनी के साथ-साथ मन की दृष्टि का साफ होना भी जरूरी है, क्योंकि सादगी और निश्छलता में ही ईश्वर का वास होता है।








