पठानकोट: आरएसएस के शताब्दी वर्ष के निमित्त शिक्षाविद् गोष्ठी का आयोजन, क्षेत्रीय संपर्क प्रमुख रजनीश अरोड़ा ने किया मार्गदर्शन

पठानकोट : राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) की स्थापना के शताब्दी वर्ष के उपलक्ष्य में देशभर में आयोजित किए जा रहे कार्यक्रमों की कड़ी में पठानकोट इकाई द्वारा स्थानीय रमा चोपड़ा कॉलेज के ऑडिटोरियम में एक भव्य ‘शिक्षाविद् गोष्ठी’ का आयोजन किया गया। इस गोष्ठी में मुख्य अतिथि एवं मुख्य वक्ता के रूप में संघ के क्षेत्रीय संपर्क प्रमुख श्री रजनीश अरोड़ा जी उपस्थित रहे, जिन्होंने शिक्षा जगत से जुड़ी विभूतियों का मार्गदर्शन किया।
प्रमुख उपस्थिति एवं नेतृत्व
कार्यक्रम की अध्यक्षता जिला कार्यवाह श्री जगजीत जी ने की। इस अवसर पर विभाग प्रचारक माननीय जोगिंदर जी एवं नगर कार्यवाह डॉ. शमशेर सिंह की देखरेख में कार्यक्रम का सफल संपादन हुआ। गोष्ठी में शहर के विभिन्न विद्यालयों एवं महाविद्यालयों के प्रधानाचार्य, वरिष्ठ शिक्षक और प्रबुद्ध शिक्षाविदों ने अपनी उपस्थिति दर्ज कराई।

संघ की विकास यात्रा और ध्येय
श्रोताओं को संबोधित करते हुए मुख्य वक्ता श्री रजनीश अरोड़ा ने संघ के संस्थापक डॉ. केशव बलिराम हेडगेवार के जीवन प्रसंगों का उल्लेख करते हुए बताया कि किन परिस्थितियों में संघ की स्थापना की आवश्यकता महसूस हुई। उन्होंने कहा:
”100 वर्षों की निरंतर साधना, तपस्या और अनगिनत बाधाओं को पार करते हुए आज संघ विश्व का सबसे बड़ा और अनूठा संगठन बन चुका है। इसकी रचना और प्रकृति केवल समाज को जोड़ने की है।”

समाज परिवर्तन के लिए ‘स्वयं बोध’ अनिवार्य
श्री अरोड़ा ने जोर देते हुए कहा कि केवल सत्ता परिवर्तन से वास्तविक सामाजिक बदलाव संभव नहीं है। इसके लिए समाज के हर नागरिक को जागरूक और जिम्मेदार बनना होगा। उन्होंने आह्वान किया कि हर व्यक्ति अपने नागरिक कर्तव्यों को पहचाने और कानून के दायरे में रहकर समाज सेवा के लिए समर्पित हो।
सामाजिक कुरीतियों पर प्रहार और स्वदेशी का मंत्र
अपने वक्तव्य के दौरान उन्होंने निम्नलिखित मुख्य बिंदुओं पर प्रकाश डाला:
- परिवार प्रबोधन: टूटते परिवारों को बचाने और नैतिक मूल्यों के संरक्षण की आवश्यकता।
- सामाजिक समरसता: छुआछूत जैसी कुरीतियों को समाप्त कर बराबरी और खुशहाली का मार्ग प्रशस्त करना।
- भारतीय विचार: ‘सर्वे भवंतु सुखिन:’ और ‘वसुधैव कुटुंबकम्’ के सिद्धांतों को जीवन में उतारना।
- आत्मनिर्भर भारत: उपभोक्तावादी सोच को त्यागकर स्वदेशी को अपनाने पर बल।
- पर्यावरण संरक्षण: प्रकृति के प्रति अपनी जिम्मेदारियों का निर्वहन करना।

जिज्ञासा समाधान एवं गणमान्य उपस्थिति
गोष्ठी के अंत में प्रश्नोत्तरी सत्र का आयोजन हुआ, जिसमें शिक्षाविदों ने अपनी जिज्ञासाएं रखीं और श्री रजनीश जी ने उनका तार्किक समाधान किया।
इस अवसर पर प्रमुख रूप से डॉ. समरेंद्र शर्मा, श्री तुषार पुंज, डॉ. दिनेश शर्मा, श्री जरनैल सिंह पटियाल, डॉ. वनिता गंडोत्रा, श्रीमती अनीता शर्मा, श्री राम मूर्ति शर्मा, श्रीमती शशिकांता, श्री सुलक्ष्य मुरगई, श्री जयंत जी, श्री विशाल चौहान सहित अनेक गणमान्य शिक्षाविद् उपस्थित रहे।








