नूरपुर पुलिस और प्रशासन की कार्यप्रणाली पर उठे बड़े सवाल: अंधेरे के आगोश में धड़ल्ले से चल रहा अवैध खनन का काला कारोबार
हिमाचल प्रदेश के नूरपुर के अंतर्गत आने वाली खन्नी पंचायत के ब्राह्मणा दा नाल और बिलां दा टाल इलाके में कानून और व्यवस्था को ठेंगा दिखाते हुए अवैध खनन का खेल खुलेआम चल रहा है। रात के सन्नाटे में जब आम जनजीवन शांत होता है और सुरक्षा एजेंसियां व जिम्मेदार महकमे गहरी नींद में सो रहे होते हैं, तब इस क्षेत्र में माफियाओं की मशीनें पूरी ताकत से कुदरत का सीना चीरने में सक्रिय हो जाती हैं।
इस गंभीर मामले के जो दृश्य सामने आए हैं, वे इसकी गवाही देते हैं कि रविवार की रात 10:42 मिनट से लेकर 11:38 मिनट के बीच इस सुनसान और अंधेरे इलाके में भारी-भरकम पोकलैंड मशीनें पूरी तरह बेखौफ होकर चल रही थीं। इन मशीनों के जरिए जमीन को छलनी कर धड़ाधड़ ओवरलोडिंग किए जा रहे डम्परों का संचालन हो रहा था, जिसे देखकर ऐसा प्रतीत होता है कि कानून के रखवालों की नाक के नीचे यह अवैध खेल किसी मिलीभगत के बिना संभव नहीं है।
सबसे बड़ा और विचारणीय प्रश्न यह है कि यदि मीडिया या सतर्क टीम रात के वक्त मौके पर पहुंचकर ग्राउंड से पुख्ता फुटेज और सबूत जुटा सकती है, तो फिर माइनिंग विभाग, स्थानीय पुलिस और प्रशासन की नजरें इन पर क्यों नहीं पड़तीं? खबरों में लगातार सच सामने आने के बाद भी इन महकमों का जमीर क्यों नहीं जागता? कभी-कभार इक्का-दुक्का चालान काटकर फाइलें बंद कर देने वाली पुलिस और माइनिंग टीम क्या इस बड़े नेटवर्क को देखने से कतरा रही है, या फिर आधी रात को जब आम इंसान घरों में रहता है, तब इतनी बड़ी-बड़ी गाड़ियों का बेरोकटोक दौड़ना किसी बड़े इशारे की ओर इशारा करता है?
अब नूरपुर के एसपी इल्म अफरोज, माइनिंग विभाग के आला अफसरों और स्थानीय पुलिस प्रशासन से सीधा सवाल यह है कि आखिर इस अवैध कारोबार पर पूरी तरह रोक क्यों नहीं लगाई जा रही? लगातार खुलासे होने के बाद भी लाचार नजर आ रहा यह सिस्टम आखिर किसे बचाने की कोशिश कर रहा है और इन खनन माफियाओं को असल में किसका संरक्षण प्राप्त है?












