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खनन कानून और केंद्र-राज्य विवाद: क्या है नया मामला और सुप्रीम कोर्ट के फैसले के मायने?

खनन कानून और केंद्र-राज्य विवाद: क्या है नया मामला और सुप्रीम कोर्ट के फैसले के मायने?

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देश में खनन (Mining) को लेकर एक नया कानून लागू हो चुका है, लेकिन इसके साथ ही केंद्र और राज्यों के अधिकारों को लेकर एक नई बहस भी छिड़ गई है। नए कानून के बाद अब राज्य सरकारें खनिज अधिकारों और मिनरल बेयरिंग लैंड पर अपनी मर्जी से कोई नया टैक्स या सेस नहीं लगा सकेगी। लेकिन कहानी सिर्फ इतनी नहीं है!

​क्या कहता है नया कानून?

​देश में Mines and Minerals (Development and Regulation) Amendment Act, 2026 लागू हो चुका है। इस कानून के बाद राज्य सरकारें मिनरल राइट्स या मिनरल बेयरिंग लैंड पर टैक्स, सेस अथवा किसी अन्य नाम से लेवी केंद्र सरकार द्वारा निर्धारित शर्तों के बाहर नहीं लगा सकेंगी। सरकार का तर्क है कि इससे देश के माइनिंग सेक्टर में एकसमान व्यवस्था बनेगी, निवेश को बढ़ावा मिलेगा और क्रिटिकल तथा स्ट्रेटेजिक मिनरल्स के एक्सट्रैक्शन को राष्ट्रीय जरूरतों के मुताबिक आगे बढ़ाया जा सकेगा।

​2024 के सुप्रीम कोर्ट के फैसले की पृष्ठभूमि

​लेकिन इस पूरे विवाद को समझने के लिए हमें 25 जुलाई 2024 के सुप्रीम कोर्ट के एक बेहद महत्वपूर्ण फैसले को समझना होगा। देश की सर्वोच्च अदालत में यह मामला नौ जजों की संविधान पीठ के सामने पहुंचा था। सवाल था—क्या राज्य सरकारों को खनिज अधिकारों पर टैक्स लगाने का अधिकार है? और क्या माइनिंग कंपनीज द्वारा सरकार को दी जाने वाली रॉयल्टी अपने आप में एक टैक्स है?

​सुप्रीम कोर्ट की नौ जजों की संविधान पीठ ने 8:1 के बहुमत से महत्वपूर्ण फैसला सुनाया। अदालत ने कहा—रॉयल्टी इज नॉट ए टैक्स (यानी माइनिंग कंपनी द्वारा मिनरल निकालने के बदले दी जाने वाली रॉयल्टी को टैक्स नहीं माना जा सकता)। इतना ही नहीं, सुप्रीम कोर्ट ने राज्यों की विधानसभाओं के मिनरल राइट्स पर टैक्स लगाने की संवैधानिक शक्ति को भी मान्यता दी। हालांकि, यह शक्ति पूर्णतः असीम नहीं थी और पार्लियामेंट द्वारा मिनरल डेवलपमेंट से संबंधित कानून में निर्धारित सीमाओं के अधीन हो सकती है।

​केंद्र बनाम राज्य: टकराव के मुख्य बिंदु

​अब यहीं से कहानी दिलचस्प हो जाती है। 2024 में सुप्रीम कोर्ट ने राज्यों की टैक्सेशन पावर को मान्यता दी, और अब 2026 में संसद द्वारा बनाए गए नए कानून ने उसी टैक्सेशन पावर के इस्तेमाल पर केंद्र द्वारा निर्धारित कंडीशंस और रिस्ट्रिक्शंस का प्रावधान कर दिया है।

  • ​नया कानूनी दायरा: अब कोई राज्य अपनी तरफ से मिनरल राइट्स या मिनरल बेयरिंग लैंड पर कोई टैक्स या सेस लगाना चाहेगा, तो उसे केंद्र द्वारा निर्धारित कानूनी दायरे में रहना होगा।
  • ​पुराने बकाये पर स्थिति: कानून लागू होने से पहले लगाया गया ऐसा टैक्स या सेस जो अभी तक राज्य सरकार के पास जमा या रिकवर नहीं हुआ था, उसे अमान्य माना जाएगा। लेकिन जो रकम राज्य सरकार पहले ही वसूल चुकी है, उसे माइनिंग कंपनीज को वापस नहीं करना होगा।

​राज्यों की चिंता और विरोध

​शायद यही कारण है कि खनिज संपदा वाले कई राज्यों में इसका विरोध दिखाई दे रहा है। राज्यों की चिंता है कि खनिज संपदा उनकी जमीन से निकलती है, माइनिंग का पर्यावरण और इन्फ्रास्ट्रक्चर पर असर भी उन्हीं राज्यों को झेलना पड़ता है, तो उससे मिलने वाले राजस्व पर उनका अधिकार कम क्यों किया जाए?

​झारखंड के मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन इस कानून के फेडरल इम्प्लिकेशंस पर सवाल उठा चुके हैं, वहीं विपक्ष की तरफ से इस नए कानून को अदालत में चुनौती देने की बात भी कही जा रही है।

​निष्कर्ष: क्या मामला फिर पहुंचेगा सुप्रीम कोर्ट?

​तो अब सवाल सिर्फ खनन या टैक्स का नहीं है, सवाल है—केंद्र और राज्यों के अधिकारों का! एक तरफ केंद्र सरकार का तर्क है कि देश की महत्वपूर्ण खनिज संपदा के लिए एकसमान राष्ट्रीय व्यवस्था जरूरी है, तो दूसरी तरफ राज्यों का सवाल है कि अगर खनिज हमारी जमीन से निकलता है, तो उससे मिलने वाले राजस्व पर हमारा अधिकार क्यों सीमित किया जाए?

​और सबसे महत्वपूर्ण—जब 2024 में सुप्रीम कोर्ट की नौ जजों की संविधान पीठ ने राज्यों की टैक्सेशन पावर को मान्यता दी थी, तो 2026 के नए कानून की संवैधानिक वैधता पर अदालत क्या रुख अपनाएगी? क्योंकि विपक्ष पहले ही इसे अदालत में चुनौती देने की बात कह चुका है।

​इसलिए, खनन पर शुरू हुई केंद्र बनाम राज्य की यह लड़ाई अभी खत्म नहीं हुई है। आने वाले दिनों में इसकी अगली और शायद सबसे महत्वपूर्ण लड़ाई एक बार फिर सुप्रीम कोर्ट में देखने को मिल सकती है।

​AMI News की यह खास रिपोर्ट

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Author: Ami News

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