वेब स्टोरी

ई-पेपर

लॉग इन करें

AMI News: BRICS में भारत का ‘डिजिटल ब्रिज’ मास्टरस्ट्रोक; डॉलर की मनमानी खत्म करने और स्थानीय मुद्राओं को मजबूत करने का तैयार हुआ ब्लूप्रिंट

BRICS शिखर सम्मेलन: डॉलर पर निर्भरता घटाने के लिए भारत की ‘डिजिटल ब्रिज’ योजना पर टिकी दुनिया की निगाहें

​

​आगामी BRICS शिखर सम्मेलन में भारत का एक बेहद महत्वपूर्ण प्रस्ताव एजेंडे के सबसे प्रमुख मुद्दों में शामिल हो सकता है। दक्षिण अफ्रीका की प्रमुख समाचार वेबसाइट IOL में प्रकाशित एक लेख के अनुसार, भारत ने BRICS सदस्य देशों के घरेलू भुगतान नेटवर्क को आपस में जोड़ने के लिए एक ‘डिजिटल ब्रिज’ बनाने का प्रस्ताव रखा है। इस पहल का मुख्य उद्देश्य सदस्य देशों के बीच किसी तीसरी विदेशी मुद्रा के बजाय सीधे और तेज स्थानीय मुद्रा में भुगतान की व्यवस्था तैयार करना है।

​डॉलर पर निर्भरता से सहम रही हैं अर्थव्यवस्थाएं

​लेख में रेखांकित किया गया है कि BRICS देश वर्तमान में अंतरराष्ट्रीय वित्तीय तंत्र और ऊर्जा कारोबार के लिए अमेरिकी डॉलर पर अत्यधिक निर्भर हैं। मध्य पूर्व में जब भी भू-राजनीतिक तनाव बढ़ता है, तो कच्चे तेल की कीमतें आसमान छूने लगती हैं। इससे पूंजी का प्रवाह प्रभावित होता है और स्थानीय मुद्राओं पर भारी दबाव बनता है।

  • ​रूस: पश्चिमी प्रतिबंधों के चलते अंतरराष्ट्रीय बैंकिंग प्रणाली SWIFT से अलग-थलग पड़ चुका है।
  • ​चीन: महंगा कच्चा तेल इसकी विनिर्माण लागत बढ़ाता है, जिससे निर्यात प्रतिस्पर्धा प्रभावित होती है।
  • ​ब्राजील, दक्षिण अफ्रीका, मिस्र और इथियोपिया: ये देश डॉलर की कमी और विनिमय दर में उतार-चढ़ाव से जूझ रहे हैं।
  • ​भारत पर प्रभाव: डॉलर के मुकाबले रुपये में गिरावट आने से भारत की डॉलर में मापी जाने वाली GDP का आकार यांत्रिक रूप से कम दिखता है, जिससे वैश्विक आर्थिक रैंकिंग प्रभावित हो सकती है।

​‘साझा BRICS मुद्रा’ नहीं, बल्कि ‘वित्तीय नेटवर्क का एकीकरण’

​IOL के लेख में यह स्पष्ट किया गया है कि भारत का यह प्रस्ताव किसी नई “कॉमन BRICS करेंसी” (साझा मुद्रा) को लॉन्च करने का नहीं है। यानी किसी भी देश को अपनी राष्ट्रीय मुद्रा खत्म नहीं करनी होगी।

​यह पूरी तरह से एक तकनीकी समाधान है। इसके तहत:

  • ​सदस्य देशों के घरेलू डिजिटल पेमेंट नेटवर्क और डिजिटल मुद्राओं (Multi-CBDC Bridge) को आपस में जोड़ा जाएगा।
  • ​ब्लॉकचेन और आधुनिक फिनटेक प्रणाली के जरिए लेन-देन को तुरंत और सुरक्षित तरीके से निपटाया जाएगा।
  • ​दो देशों के व्यापारी आपस में सीधे अपनी-अपनी स्थानीय मुद्राओं में ट्रेड सेटल कर सकेंगे।

​3 से 5 प्रतिशत तक शुल्क और समय की होगी बचत

​वर्तमान में BRICS देशों के बीच होने वाले अधिकतर अंतरराष्ट्रीय लेन-देन अमेरिकी बैंकों के जरिए पास होते हैं। इस प्रक्रिया में समय अधिक लगता है और व्यापारियों को 3 से 5 प्रतिशत तक का अतिरिक्त शुल्क भी चुकाना पड़ता है। भारतीय डिजिटल ब्रिज प्रणाली लागू होने से व्यापार की लागत और समय दोनों में भारी कमी आएगी।

​कार्यात्मक डीडॉलराइजेशन की ओर मजबूत कदम

​विशेषज्ञ भारत की इस पहल को ‘फंक्शनल डीडॉलराइजेशन’ का एक व्यावहारिक रूप मान रहे हैं। इसका मकसद डॉलर को अचानक खत्म करना नहीं, बल्कि एक मजबूत वैकल्पिक ढांचा तैयार करना है ताकि किसी भी वैश्विक संकट के दौरान BRICS देश आपस में निर्बाध व्यापार जारी रख सकें।

Ami News
Author: Ami News

trfgcvkj.blkjhgfd

Leave a Comment

और पढ़ें

Horoscope

Weather

और पढ़ें
error: Content is protected !!