भारत की आसमान में बड़ी छलांग: स्वदेशी ‘प्रोजेक्ट कुशा’ मिसाइल का सफल परीक्षण, चीन-पाक की चुनौतियों को मिलेगा मुंहतोड़ जवाब
DRDO ने ओडिशा के अब्दुल कलाम द्वीप से किया सफल परीक्षण; 2035 तक देश को मिलेगा अभेद्य एयर डिफेंस नेटवर्क
नई दिल्ली/भुवनेश्वर : भारत ने अपनी रक्षा प्रणाली को मजबूत करने और वायु रक्षा (Air Defence) के क्षेत्र में आत्मनिर्भर बनने की दिशा में एक ऐतिहासिक उपलब्धि हासिल कर ली है। रक्षा अनुसंधान एवं विकास संगठन (DRDO) ने स्वदेशी लॉन्ग-रेंज सरफेस-टू-एयर मिसाइल (LRSAM) ‘कुशा’ (Project Kusha) का सफल परीक्षण किया है। ओडिशा तट स्थित डॉ. ए.पी.जे. अब्दुल कलाम द्वीप से किए गए इस सफल परीक्षण के बाद से ही अंतरराष्ट्रीय मीडिया में भारत की इस बड़ी तकनीकी छलांग की चर्चाएं तेज हो गई हैं।
क्या है ‘प्रोजेक्ट कुशा’ और क्यों है खास?
’प्रोजेक्ट कुशा’ भारत का अपना स्वदेशी लॉन्ग-रेंज एयर डिफेंस सिस्टम है, जिसे रूस के प्रसिद्ध S-400 सिस्टम के समकक्ष माना जा रहा है।
- बहुस्तरीय सुरक्षा चक्र: इस परियोजना के तहत तीन अलग-अलग रेंज वाली इंटरसेप्टर मिसाइलें— M1 (150 किमी), M2 (250 किमी), और M3 (350–400 किमी) विकसित की जा रही हैं।
- घातक हमलावर क्षमता: यह मिसाइल सिस्टम दुश्मन के लड़ाकू विमानों, स्टेल्थ जेट्स, ड्रोन, क्रूज मिसाइलों और लंबी दूरी पर उड़ रहे रणनीतिक विमानों (जैसे AWACS) को हवा में ही निशाना बनाकर नष्ट करने में सक्षम है।
- आत्मनिर्भर भारत: वर्तमान में भारत अपनी लंबी दूरी की सुरक्षा के लिए रूस के S-400 सिस्टम पर निर्भर है। लेकिन ‘कुशा’ के पूर्ण रूप से तैनात होने के बाद विदेशी हथियारों पर भारत की निर्भरता न के बराबर रह जाएगी।
2035 तक बनेगा भारत का अपना ‘सुदर्शन चक्र’
रक्षा विशेषज्ञों के अनुसार, ‘प्रोजेक्ट कुशा’ का यह सफल परीक्षण भारत को 2035 तक एक मजबूत और एकीकृत स्वदेशी एयर डिफेंस नेटवर्क तैयार करने में मदद करेगा। यह प्रणाली भारतीय वायु सेना के ऑटोमेटेड नेटवर्क और रडार ग्रिड के साथ एकीकृत होकर काम करेगी, जिससे किसी भी हवाई खतरे का तेजी से और सटीक जवाब दिया जा सकेगा।
क्षेत्रीय सुरक्षा और रणनीतिक संतुलन
दक्षिण एशिया में बदलती रणनीतिक परिस्थितियों और सीमा पर चीन व पाकिस्तान की दोहरी चुनौतियों को देखते हुए भारत का यह स्वदेशी एयर डिफेंस सिस्टम बेहद महत्वपूर्ण माना जा रहा है।
“यह परीक्षण न केवल भारत की सैन्य ताकत को एक नई ऊंचाई पर ले जाएगा, बल्कि सीमावर्ती क्षेत्रों में रणनीतिक संतुलन और क्षेत्रीय सुरक्षा बनाए रखने में भी अहम भूमिका निभाएगा।” > — रक्षा विशेषज्ञ











