पंजाब राजनीति: 2027 चुनाव से पहले अकाली-भाजपा के पुनर्गठबंधन की सुगबुगाहट, बदलेंगे सियासी समीकरण
पंथक वोटों के बिखराव और गुटबाजी से जूझ रहे शिरोमणि अकाली दल के लिए संजीवनी बन सकता है भाजपा का साथ
विशेष संवाददाता, चंडीगढ़: पंजाब की राजनीति में अपनी खोई हुई साख और पहचान वापस पाने के लिए संघर्ष कर रहे शिरोमणि अकाली दल (SAD) के लिए भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) के साथ दोबारा हाथ मिलाना एक ‘संजीवनी’ की तरह साबित हो सकता है। राजनीतिक गलियारों की रिपोर्टों के अनुसार, वर्ष 2027 में होने वाले पंजाब विधानसभा चुनावों से पहले यदि अकाली दल और भाजपा का पुराना गठबंधन दोबारा धरातल पर उतरता है, तो यह राज्य के सियासी समीकरणों को पूरी तरह से बदलने का मादा रखता है।
एक दशक में खिसका जनाधार, गुटबाजी बनी बड़ी चुनौती
पिछले एक दशक के दौरान शिरोमणि अकाली दल के पारंपरिक वोट बैंक में बड़ी गिरावट दर्ज की गई है। पार्टी की आंतरिक चुनौतियां तब और बढ़ गईं जब साल 2025 में बागी गुट ने अलग होकर ‘शिरोमणि अकाली दल (पुनरुज्जीवित)’ नाम से नया धड़ा बना लिया।
इसके अलावा, पंथक वोट बैंक भी अब कई हिस्सों में बंट चुका है:
- वारिस पंजाब दे: लोकसभा सांसद अमृतपाल सिंह की अगुवाई वाले इस संगठन का प्रभाव।
- शिरोमणि अकाली दल (अमृतसर): सिमरनजीत सिंह मान के नेतृत्व वाला धड़ा।
इन सभी कारकों ने अकाली दल के पारंपरिक आधार को कमजोर किया है।
सत्ता की उम्मीद ही ला सकती है बिखरे समर्थकों को एक मंच पर
शिरोमणि अकाली दल का सबसे मजबूत आधार कृषि से जुड़ा जाट सिख समुदाय रहा है। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि राजनीति में ‘सत्ता’ ही वह धुरी होती है जो विभिन्न धड़ों और कार्यकर्ताओं को एकजुट रख सकती है। यदि मतदाताओं और कार्यकर्ताओं को भाजपा के साथ गठबंधन के जरिए 2027 में सत्ता में वापसी का कोई स्पष्ट रोडमैप दिखता है, तो सुखबीर सिंह बादल की अगुवाई वाले धड़े के इर्द-गिर्द बिखरे हुए मतदाताओं का फिर से एकजुट होना संभव हो सकता है।
अकेले सरकार बनाना दोनों के लिए मुश्किल
राजनीतिक विशेषज्ञों के अनुसार, वर्तमान परिस्थितियों में न तो भाजपा और न ही अकाली दल का कोई भी धड़ा अकेले दम पर पंजाब में पूर्ण बहुमत की सरकार बनाने की स्थिति में है।
विश्लेषकों का मत: > “यदि दोनों पार्टियां अलग-अलग चुनाव मैदान में उतरती हैं, तो वोटों के विभाजन का सीधा फायदा सत्तारूढ़ आम आदमी पार्टी (AAP) और प्रमुख विपक्षी दल कांग्रेस को मिलेगा। ऐसे में, राजनीतिक अस्तित्व बचाए रखने और पंजाब की सत्ता की दौड़ में वापस आने के लिए अकाली-भाजपा की साझेदारी दोनों ही दलों की आवश्यकता बनती दिख रही है।”











