सोनम वांगचुक की भूख हड़ताल और विवेक तन्खा का हस्तक्षेप: पर्दे के पीछे की पूरी कहानी
राजनीतिक गलियारों में आज भी यह समझने की पुरजोर कोशिश की जा रही है कि प्रख्यात एक्टिविस्ट सोनम वांगचुक की भूख हड़ताल खत्म कराने में कांग्रेस के वरिष्ठ राज्यसभा सांसद विवेक तन्खा ने अचानक क्या और कैसी भूमिका निभाई।
जब तक यह घटनाक्रम घटा, तब तक मोदी सरकार इस स्थिति से उपज रहे राजनीतिक संकट को टालने और स्थिति को संभालने के लिए लगातार हाथ-पैर मार रही थी। 20 जुलाई को जंतर-मंतर पर घटी घटनाओं के बाद प्रशासनिक अधिकारियों को आशंका थी कि माहौल और अधिक बिगड़ सकता है।
पीएमओ की सक्रियता और तन्खा की एंट्री
सूत्रों का कहना है कि स्थिति की गंभीरता को देखते हुए प्रधानमंत्री कार्यालय (PMO) ने सोनम वांगचुक को अपना अनशन समाप्त करने के लिए मनाने हेतु हर संभावित चैनल और संपर्क को सक्रिय कर दिया था। जब सरकारी स्तर पर की जा रही बातचीत रंग नहीं ला सकी, तब इस पूरे घटनाक्रम में सांसद विवेक तन्खा की एंट्री हुई।
तन्खा ही क्यों बने अहम कड़ी?
- मजबूत कानूनी व व्यक्तिगत संबंध: वरिष्ठ कांग्रेस नेता विवेक तन्खा और सोनम वांगचुक के बीच लंबे समय से अच्छे संबंध रहे हैं।
- सुप्रीम कोर्ट में पैरवी: जब वांगचुक को राष्ट्रीय सुरक्षा कानून (NSA) के तहत हिरासत में लिया गया था, तब तन्खा ने ही सुप्रीम कोर्ट में उनका केस सफलतापूर्वक लड़ा था।
- भरोसेमंद चेहरा: कानूनी जीत और आपसी संबंधों के कारण वांगचुक के लिए तन्खा की अपील किसी भी सरकारी मध्यस्थ या दूत की तुलना में कहीं अधिक विश्वसनीय और महत्वपूर्ण थी।
मानवीय संवेदना या राजनीतिक सेतु?
विवेक तन्खा का इस पूरे मामले पर कहना है कि उन्होंने केवल इंसानियत के नाते हस्तक्षेप किया था, क्योंकि वांगचुक का लगातार गिरता स्वास्थ्य चिंता का विषय बना हुआ था।
हालाँकि, राजनीतिक सूत्रों का दावा कुछ अलग ही तस्वीर पेश करता है। सूत्रों के मुताबिक, जब सरकारी मध्यस्थों की अपनी तमाम कोशिशें नाकाम साबित हुईं, तब उन्होंने चुपचाप विवेक तन्खा से संपर्क साधा और उनसे वांगचुक को समझाने का अनुरोध किया।
राजनीतिक चर्चाओं का बाजार गर्म
विवेक तन्खा ने यह कदम विशुद्ध रूप से मानवीय आधार पर उठाया था या फिर वे अनजाने में सरकार और वांगचुक के बीच एक राजनीतिक ‘ब्रिज’ (पुल) बन गए—यह सवाल अब सियासी गलियारों में चर्चा का मुख्य विषय बना हुआ है।
बड़ा सवाल: क्या यह महज एक मानवीय पहल थी या पर्दे के पीछे रचा गया कोई रणनीतिक राजनीतिक समझौता?
हालाँकि, इस बात में कोई दो राय नहीं है कि वांगचुक की भूख हड़ताल अचानक समाप्त हो गई और केंद्र सरकार तथा पीएमओ एक बड़े और गंभीर राजनीतिक संकट से फिलहाल बच निकले। अंदरूनी सूत्रों का मानना है कि इस पूरे नाटकीय घटनाक्रम की असल और पूरी कहानी का सामने आना अभी बाकी है।











