लाल सागर में हूती हमले: अमेरिका-ईरान तनाव के बीच भारत की तेल आपूर्ति पर कितना असर?
सऊदी अरब के तेल ठिकानों को बनाया निशाना; विशेषज्ञों के अनुसार भारत के लिए तत्काल आपूर्ति संकट नहीं
नई दिल्ली : अमेरिका और ईरान के बीच गहराते तनाव की आँच अब होर्मुज जलडमरूमध्य से निकलकर लाल सागर (रेड सी) तक पहुँच चुकी है। ईरान समर्थित हूती विद्रोहियों ने एक बार फिर सऊदी अरब के ऊर्जा बुनियादी ढाँचे और प्रमुख समुद्री व्यापारिक मार्गों को निशाना बनाना शुरू कर दिया है। इससे दुनिया के सबसे संवेदनशील और महत्वपूर्ण ऊर्जा सप्लाई रूट पर अस्थिरता बढ़ गई है।
हालाँकि, अंतरराष्ट्रीय मामलों और ऊर्जा विशेषज्ञों का मानना है कि इस वैश्विक संकट के बावजूद फिलहाल भारत के लिए रूस से होने वाली कच्चे तेल की आपूर्ति पर किसी बड़े खतरे की संभावना कम है।
रूस से आने वाले तेल टैंकरों को क्यों मिल रही है राहत?
भारत अपनी कुल कच्चे तेल की जरूरत का लगभग 85% आयात करता है, जिसमें से बड़ा हिस्सा समुद्री रास्तों और स्वेज नहर से होकर गुजरता है। युद्ध और सैन्य तनाव के दौरान शिपिंग लागत बढ़ना स्वाभाविक है, लेकिन इस बार का गणित थोड़ा अलग है:
- रणनीतिक संबंध: ईरान और रूस के बीच गहरे रणनीतिक और राजनीतिक संबंध हैं। हूती विद्रोहियों ने पहले भी स्पष्ट किया है कि रूस और चीन से जुड़े जहाजों को निशाना नहीं बनाया जाएगा।
- लक्षित हमले: हूती विद्रोहियों का मुख्य ध्यान अमेरिका, ब्रिटेन, इज़राइल और हालिया घटनाक्रमों में सऊदी अरब से जुड़े जहाजों पर है।
- ‘शैडो फ्लीट’ की चुनौती: हालाँकि, विशेषज्ञों ने चेतावनी दी है कि रूस अपने कई तेल टैंकरों का संचालन ‘शैडो फ्लीट’ (गुमनाम जहाजों का बेड़ा) के ज़रिए करता है। यदि किसी जहाज की पहचान स्पष्ट नहीं होती या उस पर पश्चिमी झंडा/बीमा दिखता है, तो उस पर हमले का जोखिम बना रहेगा।
भारत ने रूस से बढ़ाई खरीद: मार्च-मई के दौरान 30% का उछाल
पश्चिम एशिया में बढ़ते संघर्ष के बीच भारत ने अपनी ऊर्जा सुरक्षा को प्राथमिकता देते हुए रूस से कच्चे तेल का आयात और बढ़ा दिया है।
व्यापारिक आंकड़ों की झलक:
- कुल खरीद: मार्च से मई के बीच भारत ने रूस से लगभग 17.13 अरब डॉलर का कच्चा तेल खरीदा।
- वार्षिक वृद्धि: यह पिछले वर्ष की समान अवधि की तुलना में लगभग 30% अधिक है।
- रुपये में भुगतान: भारत ने इस दौरान एक बड़ी राशि का भुगतान भारतीय रुपये में किया, जिससे दोनों देशों के बीच द्विपक्षीय व्यापार सहयोग और मजबूत हुआ है।
2024 से अलग हैं मौजूदा हालात
विशेषज्ञों के मुताबिक, 2024 में इज़राइल-हमास युद्ध के समय हूतियों का मुख्य ध्यान इज़राइल और उसके पश्चिमी सहयोगियों पर था। अब उनका फ़ोकस सऊदी अरब और उसके ऊर्जा तंत्र पर शिफ्ट होता दिख रहा है।
दूसरी ओर, अमेरिका के कड़े रुख और प्रतिबंधों के कारण ईरान स्वयं आर्थिक दबाव महसूस कर रहा है, जिससे हूती विद्रोहियों को मिलने वाली सीधी मदद सीमित हुई है।
आगे का रास्ता और भारत की चुनौतियाँ
फिलहाल भारत के लिए कच्चे तेल की तत्काल किल्लत की स्थिति नहीं है। लेकिन यदि लाल सागर का यह विवाद लंबा खिंचता है, तो:
- समुद्री जहाजों का बीमा प्रीमियम (Insurance Premium) बढ़ जाएगा।
- शिपिंग/भाड़ा लागत में भारी बढ़ोतरी होगी।
- अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतें ऊपर जा सकती हैं।
इन संभावित जोखिमों से निपटने के लिए भारत सरकार और तेल कंपनियाँ वैकल्पिक समुद्री रास्तों और वैश्विक ऊर्जा सुरक्षा पर लगातार नज़र बनाए हुए हैं।











