देश में जंक फूड की खपत बनी गंभीर चिंता: ICMR-NIN ने सिफारिश की—स्कूलों के पास बिक्री पर लगे रोक और फैट-शुगर पर बढ़े टैक्स
अल्ट्रा-प्रोसेस्ड फूड की बिक्री में 150% का उछाल; 15 से 49 वर्ष के 23.5% भारतीय मोटापे के शिकार
नई दिल्ली (विशेष संवाददाता): देश में जंक फूड और अल्ट्रा-प्रोसेस्ड खाद्य पदार्थों की तेजी से बढ़ती खपत ने सरकार और स्वास्थ्य विशेषज्ञों के कान खड़े कर दिए हैं। प्राप्त आंकड़ों के अनुसार, बीते कुछ वर्षों में देश के भीतर जंक फूड की बिक्री में 150 प्रतिशत का भारी इजाफा दर्ज किया गया है। बच्चों और युवाओं को इसके खतरनाक दुष्प्रभावों से बचाने के लिए ‘इंडियन काउंसिल ऑफ मेडिकल रिसर्च’ (ICMR) और ‘नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ न्यूट्रिशन’ (NIN) की अगुवाई वाले विशेषज्ञ समूह ने एक नीतिगत रिपोर्ट जारी कर सख्त कदम उठाने की सिफारिश की है।
विशेषज्ञ समिति की मुख्य सिफारिशें
स्वास्थ्य मंत्रालय और सरकार के विचारार्थ सौंपी गई इस रिपोर्ट में निम्नलिखित कड़े कदम उठाने का सुझाव दिया गया है:
- स्कूलों के पास बिक्री पर पाबंदी: देश भर के स्कूलों के 50 मीटर के दायरे में जंक फूड और अनहेल्दी स्नेक्स की बिक्री पर पूरी तरह से प्रतिबंध लगाया जाए।
- विज्ञापन नीति में सख्ती: बच्चों को आकर्षित करने वाले जंक फूड के विज्ञापनों और प्रचार-प्रसार पर कड़े नियम लागू किए जाएं।
- पैकेट पर चेतावनी लेबल: पैकेज्ड फूड के फ्रंट पैकेट पर स्पष्ट, सरल और आसानी से पढ़े जाने वाले चेतावनी लेबल अनिवार्य हों।
- अधिक नमक, चीनी व फैट पर अतिरिक्त टैक्स: अत्यधिक नमक, चीनी और वसा वाले उत्पादों पर अतिरिक्त टैक्स लगाया जाए, ताकि इनकी खपत को कम किया जा सके।
बाजार में बेतहाशा बढ़ोतरी (2006 से 2023 के आंकड़े)
रिपोर्ट के अनुसार, भारत में अल्ट्रा-प्रोसेस्ड फूड का बाजार बहुत तेजी से फैला है:
- 2006 से 2019 तक का सफर: वर्ष 2006 में इन उत्पादों की रिटेल बिक्री $0.9 बिलियन (लगभग 90 करोड़ डॉलर) थी, जो 2019 तक बढ़कर $37.9 बिलियन हो गई।
- 150% की वृद्धि: वर्ष 2009 से 2023 के बीच जंक फूड की कुल बिक्री में लगभग 150 प्रतिशत का उछाल देखा गया।
देश में गहराता मोटापे का संकट
विशेषज्ञों का स्पष्ट मानना है कि जंक फूड की लत देश में मोटापे और उससे जुड़ी बीमारियों का मुख्य कारण बन रही है। आंकड़े बताते हैं कि 15 से 49 वर्ष की आयु के 23.5 प्रतिशत भारतीय अधिक वजन या मोटापे की समस्या से ग्रस्त हैं।
पुरुषों में यह आंकड़ा 22.9 प्रतिशत से बढ़कर 27.3 प्रतिशत हो गया है, जबकि महिलाओं में यह 24 प्रतिशत से बढ़कर 30.7 प्रतिशत तक पहुँच चुका है। सरकार अब इन सिफारिशों का अध्ययन कर रही है और जल्द ही इस दिशा में ठोस नीतिगत फैसले ले सकती है।










