शक्ति की भक्ति का महापर्व: प्रथम नवरात्र पर मां शैलपुत्री का पूजन

आज से चैत्र नवरात्रि का शुभारंभ हो गया है। हिंदू धर्म में नवरात्रि का विशेष महत्व है, जिसमें नौ दिनों तक मां दुर्गा के नौ अलग-अलग स्वरूपों की पूजा-अर्चना की जाती है। नवरात्रि के पहले दिन मां शैलपुत्री की पूजा का विधान है। मां शैलपुत्री सौभाग्य और शांति की देवी मानी जाती हैं।
कौन हैं मां शैलपुत्री?
मां दुर्गा अपने पहले स्वरूप में ‘शैलपुत्री’ के नाम से जानी जाती हैं। पर्वतराज हिमालय के घर पुत्री के रूप में जन्म लेने के कारण इनका नाम ‘शैलपुत्री’ पड़ा। मां का यह स्वरूप बेहद शांत और सरल है। उनके दाहिने हाथ में त्रिशूल और बाएं हाथ में कमल का फूल सुशोभित है, और वे नंदी (वृषभ) पर सवार हैं। इन्हें सती, पार्वती और हेमवती के नाम से भी जाना जाता है।

पौराणिक इतिहास और कथा
मां शैलपुत्री का इतिहास उनके पूर्व जन्म से जुड़ा है। पौराणिक कथाओं के अनुसार, अपने पूर्व जन्म में वे प्रजापति दक्ष की पुत्री ‘सती’ थीं। उनका विवाह भगवान शिव से हुआ था। एक बार राजा दक्ष ने एक विशाल यज्ञ का आयोजन किया, जिसमें उन्होंने सभी देवी-देवताओं को आमंत्रित किया, लेकिन भगवान शिव का अपमान करने के लिए उन्हें न्योता नहीं दिया।
माता सती बिना बुलाए अपने पिता के घर पहुंच गईं, जहां उन्होंने भगवान शिव के प्रति तिरस्कार भाव देखा। अपने पति के अपमान को सहन न कर पाने के कारण सती ने उसी यज्ञ की अग्नि में कूदकर अपने प्राण त्याग दिए। अगले जन्म में उन्होंने हिमालय की पुत्री के रूप में जन्म लिया और कठिन तपस्या के बाद पुनः भगवान शिव को पति के रूप में प्राप्त किया।

पूजन विधि और महत्व
नवरात्रि के पहले दिन कलश स्थापना (घटस्थापना) का विशेष महत्व है। शुभ मुहूर्त में कलश स्थापित करने के बाद मां शैलपुत्री का आह्वान किया जाता है।
- प्रिय भोग: मां शैलपुत्री को सफेद वस्तुएं अत्यंत प्रिय हैं। इसलिए पूजा में उन्हें गाय के घी का भोग या सफेद मिठाई अर्पित की जाती है। माना जाता है कि ऐसा करने से भक्त रोगों से मुक्त होते हैं।
- शुभ रंग: प्रथम दिन पूजा के लिए ‘पीला’ या ‘सफेद’ रंग शुभ माना जाता है, जो शांति और उत्साह का प्रतीक है।
- मंत्र: पूजा के दौरान इस मंत्र का जाप फलदायी होता है:
- वन्दे वाञ्छितलाभाय चन्द्रार्धकृतशेखराम। वृषारूढां शूलधरां शैलपुत्रीं यशस्विनीम॥
योगिक और आध्यात्मिक दृष्टिकोण
योग शास्त्र के अनुसार, मां शैलपुत्री का निवास शरीर के ‘मूलाधार चक्र’ में माना जाता है। योग साधना करने वाले साधक नवरात्रि के पहले दिन अपने मन को मूलाधार चक्र में स्थित कर अपनी साधना का प्रारंभ करते हैं। मां की कृपा से व्यक्ति के जीवन में स्थिरता और दृढ़ता आती है।








