5 साल का हिसाब: जनता की अदालत में पार्षदों का ‘रिपोर्ट कार्ड’

पठानकोट: जैसे-जैसे नगर निगम चुनावों की घड़ी नज़दीक आ रही है, शहर की गलियों में चुनावी चर्चाएं तेज़ हो गई हैं। लेकिन इस बार माहौल पिछली बार जैसा नहीं है। AMI News की टीम ने जब विभिन्न वार्डों का दौरा किया और जनता से उनके पार्षदों (काउंसलर्स) के पिछले 5 साल के कामकाज का हिसाब मांगा, तो विकास के दावों की कलई खुलती नज़र आई। जनता के चेहरे पर गुस्सा और आंखों में उपेक्षा का दर्द साफ दिखाई दे रहा था।
मटमैले पानी ने उड़ाई नींद

वार्डों के दौरे के दौरान सबसे भयावह तस्वीर पेयजल व्यवस्था की सामने आई। मोहल्ला निवासियों ने टीम को बोतलों में भरा हुआ गंदा और मटमैला पानी दिखाया। एक महिला निवासी ने रोते हुए कहा, “हम यह पानी कैसे पिएं? बच्चे बीमार हो रहे हैं, खाना बनाने के लिए बाहर से पानी लाना पड़ता है।” सीवरेज और पेयजल की पाइपलाइनें मिक्स होने की शिकायतें आम हैं, लेकिन प्रशासन और पार्षद इस पर मौन साधे हुए हैं।

कूड़े के ढेर और टूटी गलियां?
कई मोहल्लों की गलियां कूड़ेदान में तब्दील हो चुकी हैं। सड़कों पर गहरे गड्ढे और उनमें जमा सीवरेज का पानी स्वच्छ भारत अभियान के दावों को मुंह चिढ़ा रहा है। नालियां जाम हैं और सड़ांध इतनी है कि लोगों का अपने घरों के बाहर बैठना भी मुहाल हो गया है। स्थानीय युवाओं का कहना है कि बार-बार शिकायत के बावजूद नई सड़कें तो दूर, पुरानी सड़कों की मरम्मत तक नहीं की गई।
पार्षदों का ‘लापता’ व्यवहार: चुनाव जीते और गायब हुए!
जनता का सबसे बड़ा गुस्सा पार्षदों के व्यवहार को लेकर है। सर्वे के दौरान कई हैरान करने वाली बातें सामने आईं:
अपरिचित चेहरा: कुछ युवाओं ने तो यहाँ तक कहा कि उन्हें अपने पार्षद का नाम और चेहरा तक याद नहीं है।
चुनावी वादे: लोगों ने कहा कि पार्षद सिर्फ वोट मांगने के समय हाथ जोड़कर गलियों में आते हैं, जीतने के बाद 5 साल तक उनके दर्शन दुर्लभ हो जाते हैं।
फंड का अभाव या इच्छाशक्ति की कमी?: पार्षद अक्सर फंड न होने का रोना रोते हैं, जबकि जनता इसे इच्छाशक्ति की कमी मानती है।

जनता की अदालत: मिला ‘जीरो’ रिपोर्ट कार्ड
जब हमारी टीम ने लोगों से पूछा कि वे अपने पार्षद को 10 में से कितने नंबर देंगे, तो जवाब चौंकाने वाले थे। वार्ड के अधिकांश लोगों ने एक सुर में ‘जीरो’ या ‘निल’ (शून्य) नंबर दिए। एक बुजुर्ग महिला ने कहा, “जिन्होंने हमें नर्क में रहने को मजबूर कर दिया, उन्हें नंबर देने का क्या मतलब?” हालांकि, कुछ गिने-चुने वार्डों में पार्षद के निजी व्यवहार को लेकर लोग संतुष्ट दिखे, लेकिन विकास कार्यों के मामले में असंतोष हर जगह व्याप्त था।
निष्कर्ष: अब बहाने नहीं, हिसाब चाहिए
अब समय आ गया है जब जनता अपने वोट की ताकत से 5 साल की उपेक्षा का हिसाब चुकता करेगी। AMI News लगातार हर वार्ड की जमीनी हकीकत आप तक पहुँचाता रहेगा। क्या आपके पार्षद ने अपना वादा पूरा किया? या आपके हिस्से में भी सिर्फ गंदगी और गंदा पानी ही आया?








