मन चंगा तो कठौती में गंगा: समरसता के प्रतीक गुरु रविदास

आज जब दुनिया वैचारिक मतभेदों और असमानता से जूझ रही है, तब संत गुरु रविदास जी की वाणी एक मार्गदर्शक मशाल की तरह प्रतीत होती है। “मन चंगा तो कठौती में गंगा” का कालजयी संदेश देने वाले गुरु जी ने कर्म की प्रधानता और मन की शुद्धता को सर्वोपरि माना।
समानता और ‘बेगमपुरा’ का संकल्प
गुरु रविदास जी ने एक ऐसे समाज की कल्पना की थी जहाँ कोई दुखी न हो और कोई भेदभाव न हो। उन्होंने इसे ‘बेगमपुरा’ (बिना गम का शहर) कहा। उनके शब्दों में:
“ऐसा चाहूँ राज मैं, जहाँ मिले सबन को अन्न। छोंट-बड़े सब सम बसें, रविदास रहे प्रसन्न।”

यह पंक्तियाँ आधुनिक लोकतंत्र और कल्याणकारी राज्य की आधारशिला की याद दिलाती हैं, जहाँ हर नागरिक को सम्मान और बुनियादी ज़रूरतें प्राप्त हों।
भक्ति और कर्म का समन्वय
रविदास जी ने सिखाया कि ईश्वर की भक्ति के लिए संसार को छोड़ने की आवश्यकता नहीं है। उन्होंने अपने पैतृक कार्य (चर्मकार) को करते हुए ही आध्यात्मिक ऊँचाइयों को प्राप्त किया। उन्होंने आडंबरों का विरोध किया और बताया कि सच्ची भक्ति जाति या कुल में नहीं, बल्कि अंतर्मन की पवित्रता में वास करती है। यही कारण था कि चित्तौड़ की रानी झाली और मीराबाई जैसी विभूतियों ने उन्हें अपना गुरु स्वीकार किया।

आधुनिक भारत में प्रासंगिकता
आज के डिजिटल युग में भी गुरु जी के सिद्धांत—श्रम की गरिमा, सामाजिक एकता और परोपकार—भारत के सामाजिक ताने-बाने को मजबूत करने के लिए अनिवार्य हैं। उनकी जयंती केवल एक उत्सव नहीं, बल्कि उनके बताए ‘समरसता’ के मार्ग पर चलने का संकल्प लेने का दिन है।
निष्कर्ष
गुरु रविदास जी का जीवन इस बात का प्रमाण है कि इंसान अपने जन्म से नहीं, बल्कि अपने कर्मों और विचारों से महान बनता है। आइए, इस पावन अवसर पर हम उनके ‘बेगमपुरा’ के सपने को साकार करने की दिशा में कदम बढ़ाएं।









