दुनियां का इकलौता ‘साइलेंट विलेज’, जहां का सन्नाटा बयां करता है दर्द की कहानी

डोडा: भारत में रहस्यों और अनोखी परंपराओं वाले गांवों की कोई कमी नहीं है, लेकिन जम्मू-कश्मीर के डोडा जिले में एक ऐसा गांव है जिसकी हकीकत किसी को भी हैरान कर सकती है। इस गांव का नाम है धड़काई (दधकाई), जिसे आज पूरी दुनिया ‘Silent Village’ के नाम से जानती है। इस गांव की सबसे अजीब और दर्दनाक बात यह है कि यहां की आधी से ज्यादा आबादी न तो बोल सकती है और न ही सुन सकती है। यहां लगभग हर परिवार में कम से कम एक सदस्य मूक-बधिर (Deaf and Dumb) है।
1901 से शुरू हुआ था ये रहस्यमयी सिलसिला
गांव के बुजुर्गों के मुताबिक, इस रहस्यमयी सिलसिले की शुरुआत आज से करीब 125 साल पहले हुई थी। गांव में पहला मूक-बधिर बच्चा साल 1901 में पैदा हुआ था। इसके बाद जैसे-जैसे साल बीतते गए, ऐसे बच्चों के पैदा होने की संख्या लगातार बढ़ती चली गई। आज आलम यह है कि इस गांव में आम गांवों की तरह बच्चों की खिलखिलाहट, बातचीत या शोर-शराबा सुनाई नहीं देता; पूरा गांव एक अजीब से सन्नाटे में डूबा रहता है।
दैवीय श्राप नहीं, साइंस ने खोला राज
गांव के कुछ बुजुर्ग आज भी इसे किसी पुराने दैवीय प्रकोप या श्राप से जोड़कर देखते हैं, लेकिन डॉक्टरों और वैज्ञानिकों की रिसर्च कुछ और ही कहानी बयां करती है। वैज्ञानिकों के मुताबिक:
यह कोई श्राप नहीं, बल्कि एक दुर्लभ जेनेटिक (आनुवंशिक) बीमारी है। इस गांव के लोग सदियों से बाहरी दुनिया से कटे हुए हैं। लंबे समय तक एक ही सीमित समुदाय और आपस के रिश्तेदारों में शादियां (Consanguineous Marriages) होने के कारण यह जेनेटिक खराबी पीढ़ी-दर-पीढ़ी आगे बढ़ती चली गई, जिसने आज पूरे गांव को अपनी चपेट में ले लिया है।

इशारों की भाषा बनी जीने का सहारा
बोल और सुन न पाने के बावजूद यहां के लोगों ने हार नहीं मानी है। गांव के लोगों ने जीने का एक अनोखा तरीका ढूंढ निकाला है। यहां बच्चे, बूढ़े और जवान सभी इशारों की भाषा (Sign Language) में महारत रखते हैं। लोग एक-दूसरे से इतनी तेजी से इशारों में बात करते हैं कि बाहर से आने वाला कोई भी व्यक्ति दंग रह जाता है। अपनी रोजी-रोटी के लिए यहां के लोग मुख्य रूप से खेतीबाड़ी, पशुपालन और मजदूरी पर निर्भर हैं।

मदद की गुहार: विशेष स्कूल और डॉक्टरों की दरकार
इस गांव की सबसे बड़ी चुनौती शिक्षा और स्वास्थ्य सेवाओं की भारी कमी है। स्थानीय लोगों का कहना है कि अगर सरकार यहां मूक-बधिर बच्चों के लिए विशेष स्कूल (Special Schools) और स्पीच थेरेपिस्ट की व्यवस्था करे, तो इन बच्चों का भविष्य सुधर सकता है।
हालांकि, पिछले कुछ सालों में देश-विदेश के कई बड़े रिसर्चर्स और डॉक्टरों की टीम इस गांव का दौरा कर चुकी है, ताकि इस दुर्लभ जेनेटिक म्यूटेशन को रोक कर आने वाली पीढ़ी को इस सन्नाटे से बचाया जा सके। अब देखना यह है कि प्रशासन और विज्ञान मिलकर कब तक इस ‘साइलेंट विलेज’ की आवाज वापस ला पाते हैं।








