पठानकोट-मंडी फोरलेन: करोड़ों फूंकने के बाद भी ‘कमजोर’ नींव, बरसात से पहले ही जवाब देने लगे डंगे
धीमी रफ्तार और घटिया निर्माण पर उठे सवाल; 61 मील सुरंग से ठानपुरी तक रिटेनिंग वॉल फूली, परौर से पद्धर तक 80 किमी हिस्से की DPR तक नहीं हुई तैयार।

पठानकोट/मंडी: करोड़ों रुपए की भारी-भरकम लागत से तैयार हो रही सामरिक दृष्टि से बेहद महत्त्वपूर्ण पठानकोट-मंडी फोरलेन परियोजना एक बार फिर गंभीर सवालों के घेरे में है। इस महत्त्वाकांक्षी प्रोजेक्ट में निर्माण कार्य की सुस्त रफ्तार और घटिया गुणवत्ता अब खुलकर धरातल पर दिखने लगी है। हालात यह हैं कि परियोजना का काम अधर में लटका है, जिससे तय समयसीमा के भीतर इसके पूरा होने की उम्मीदें बेहद कम नजर आ रही हैं।
दूसरी ओर, जहां-जहां निर्माण कार्य पूरा हो चुका है, वहां गुणवत्ता को लेकर गंभीर तकनीकी खामियां सामने आ रही हैं। 61 मील सुरंग से लेकर ठानपुरी तक कई संवेदनशील स्थानों पर सड़क किनारे बनाई गई रिटेनिंग वॉल (डंगे) अभी से कमजोर पड़ने लगी हैं। कई जगह तो स्थिति इतनी बदतर है कि दीवार के पत्थर बाहर की ओर फूल चुके हैं, जो कभी भी धराशायी हो सकते हैं।
बरसात से पहले हादसे का खौफ, ड्रेनेज सिस्टम नदारद
अभी मानसून ने पूरी तरह दस्तक भी नहीं दी है, लेकिन निर्माण की इस बदहाली ने स्थानीय लोगों और वाहन चालकों की धड़कनें बढ़ा दी हैं। स्थानीय जनता का साफ कहना है कि यदि बिना बारिश के डंगे जवाब दे रहे हैं, तो भारी बरसात के दौरान यहां कभी भी कोई बड़ा हादसा हो सकता है। पहाड़ी क्षेत्रों में इस प्रकार के निर्माण के लिए मजबूत ड्रेनेज सिस्टम और तकनीकी मानकों का कड़ाई से पालन अनिवार्य होता है, लेकिन यहां गुणवत्ता के बजाय सिर्फ ‘खानापूर्ति’ की गई है। सालों से स्थानीय लोग धूल, भारी जाम और अव्यवस्थित ट्रैफिक का दंश झेल रहे हैं, उस पर से इस खौफनाक निर्माण ने उनकी चिंता और बढ़ा दी
लापरवाह एजेंसियों और अफसरों पर कसे शिकंजा: जनता की मांग
स्थानीय निवासियों और विभिन्न सामाजिक संगठनों ने प्रदेश प्रशासन व केंद्र सरकार से इस पूरे प्रोजेक्ट की निष्पक्ष तकनीकी जांच (Technical Audit) करवाने की मांग की है। लोगों ने चेतावनी दी है कि यदि समय रहते संवेदनशील स्थलों पर सुदृढ़ीकरण और मरम्मत का कार्य शुरू नहीं किया गया, तो बरसात में भारी भू-स्खलन (Landslides) और सड़क धंसने की घटनाओं से इनकार नहीं किया जा सकता। जनता ने मांग उठाई है कि घटिया निर्माण के लिए जिम्मेदार लापरवाह अधिकारियों और ठेकेदार कंपनियों की जवाबदेही तय कर उन पर सख्त कार्रवाई की जाए।

सामरिक रूट पर महा-लापरवाही: 80 किमी की DPR ही गायब
इस महा-परियोजना की कछुआ चाल का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि सामरिक और सैन्य दृष्टि से सबसे महत्वपूर्ण माने जाने वाले परौर से पद्धर तक के करीब 80 किलोमीटर हिस्से की विस्तृत परियोजना रिपोर्ट (DPR) तक अभी तक तैयार नहीं हो पाई है। यह वही मार्ग है जो सेना की आवाजाही और लेह-लद्दाख सीमा के लिए लाइफलाइन माना जाता है। स्थानीय लोगों का कहना है कि जब इतने सालों बाद भी शुरुआती कागजी प्रक्रिया (DPR) ही अधूरी है, तो पूरा हाईवे समय पर कैसे बनेगा?
- कम श्रमशक्ति: कई प्रमुख साइट्स पर आधुनिक मशीनरी और श्रमिकों की संख्या बेहद कम है, जिससे निर्माण एजेंसियों की गैर-गंभीरता साफ झलकती है।
- निगरानी का अभाव: करोड़ों खर्च होने के बाद भी नई संरचनाओं का इतनी जल्दी कमजोर होना निगरानी प्रणाली की विफलता को दर्शाता है।
- मानकों से समझौता: आरोप है कि मुनाफे के चक्कर में तय मानकों को ताक पर रखकर सामग्री का इस्तेमाल किया गया है।









